Monday, January 18, 2016

पुष्कर ही नहीं यहां भी पूजे जाते हैं ब्रह्माजी

बरसठी। पुष्कर के बारे में कहा जाता है कि पूरे भारत में ब्रह्माजी का इकलौता मंदिर है, जहां ब्रह्माजी की पूजा की जाती है लेकिन यह गलत है। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के बरसठी ब्लाक के सरसरा गांव में भी ब्रह्माजी की पूजा की जाती है। बरसठी रेलवे स्टेशन के समीप स्थित शिव मंदिर के पास भगवान ब्रह्माजी मूर्ति स्थापित है। भक्त पूजन जरूर करते हैं लेकिन यहां कोई मंदिर नहीं है। 
ब्रह्माजी की मूर्ति खुले अासमान के नीचे स्थापित है। गांव वाले चौमुखा के नाम से इस मूर्ति की पूजा करते हैं। मूर्ति में चार मुख स्पष्ट है। जिसे चतुरानन अर्थात ब्रह्माजी कहा जा सकता है। मूर्ति स्थापना के समय ही लोगों को इस बात का ध्यान रहा होगा की जो कोई ब्रह्माजी का मंदिर बनवाएगा उसका विनाश हो जाएगा। इस बात को ध्यान में रखकर मंदिर का निर्माण नहीं हुअा है। खुले में ब्रह्माजी की मूर्ति स्थापित है। मूर्ति के बारे में तो किसी को नहीं पता है कि यह कितने साल पुरानी है। लेकिन बताया जाता है कि गांव के ही मिश्रा परिवार द्वारा इसकी स्थापना की गई है। पुरातत्व विभाग द्वारा यदि इसकी जांच की जाए तो मूर्ति कितनी पुरानी है पता चल सकती है। 

क्यों नहीं होती ब्रह्माजी की पूजा
मान्यता है कि एक बार ब्रह्मा के मन में धरती की भलाई के लिए यज्ञ करने का ख्याल आया। यज्ञ के लिए जगह की तलाश करनी थी। लिहाजा उन्होंने अपनी बांह से निकले हुए कमल को धरती लोक की ओर भेज दिया। वो कमल इस शहर तक पहुंचा। कमल बगैर तालाब के नहीं रह सकता इसलिए यहां एक तालाब का निर्माण हुआ। यज्ञ के लिए ब्रह्मा यहां पहुंचे। लेकिन उनकी पत्नी सावित्री वक्त पर नहीं पहुंच पाईं। यज्ञ का समय निकल रहा था। लिहाजा ब्रह्मा जी ने एक स्थानीय ग्वाल बाला से शादी कर ली और यज्ञ में बैठ गए।

सावित्री थोड़ी देर से पहुंचीं। लेकिन यज्ञ में अपनी जगह पर किसी और औरत को देखकर गुस्से से पागल हो गईं। उन्होंने ब्रह्मा जी को शाप दिया कि जाओ इस पृथ्वी लोक में तुम्हारी कहीं पूजा नहीं होगी। यहां का जीवन तुम्हें कभी याद नहीं करेगा। सावित्री के इस रुप को देखकर सभी देवता लोग डर गए। उन्होंने उनसे विनती की कि अपना शाप वापस ले लीजिए। लेकिन उन्होंने नहीं लिया। जब गुस्सा ठंडा हुआ तो सावित्री ने कहा कि इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में आपकी पूजा होगी। कोई भी दूसरा आपका मंदिर बनाएगा तो उसका विनाश हो जाएगा।

Sunday, January 17, 2016

दो पड़ोसी गांव दूरी महज 3किमी, जहां जाते हैं लोग ट्रेन से


बरसठी। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में दो ऐसे गांव हैं जहां की दूरी महज 3 किमी है। एक दूसरे गांव में जाने के लिए लोग ट्रेन का सहारा लेते हैं। दोनों गांवों में रेलवे स्टेशन है। जहां कई पैसेंजर गाडियां भी रुकती है।

जौनपुर जिले के बरसठी ब्लाक में सरसरा और कटवार दो गांव हैं। दोनों गांव एक दूसरे के पड़ोसी है। दोनों गांवों को जोड़ने के लिए रेलवे लाइन ही सहारा है। सड़क मार्ग से दोनों गांवों की दूरी करीब 6 किमी हैं, वहीं रेल मार्ग से मात्र 3 किमी है। इलाहाबाद जौनपुर रेलमार्ग पर स्थित दोनों गांवों में रेलवे स्टेशन हैं। सरसरा में बरसठी स्टेशन तो कटवार में कटवार बाजार स्टेशन है। बरसठी स्टेशन जहां अंग्रेजों के जमाने में बना था वहीं कटवार बाजार रेलवे हाल्ट महज दो साल पहले बना। कटवार बाजार हाल्ट रेलवे के बारे में कहानी बड़ी मजेदार है। कटवार सहित असपास गांव के लोग जब ट्रेन कटवार पहुंचती थी तो चैन पुलिंग कर रोक देते थे। इससे रेल प्रशासन काफी परेशान था। बाद में तत्कालीन सांसद स्वामी चिन्मयानंद के प्रयास से कटवार को 2 साल पहले हाल्ट बनाया गया। ग्रामीणों ने स्टेशन की घोषणा होते ही श्रमदान से वहां पर मिट्टी वगैरह डालकर स्टेशन का रूप दे दिए हैं। दोनों गांव के लोग कभी पैदल
एक दूसरे गांव में आते-जाते थे आज ट्रेन से आते-जाते हैं।  

Wednesday, October 7, 2015

बिहार चुनाव में रोज नए शब्दों का उदय

बिहार चुनाव इस बार कुछ अलग अंदाज में दिख रहा है। रोज नए-नए शब्दों का उदय हो रहा है। नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, नरेंद्र मोदी, अमित शाह ने जिस प्रकार से शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं उससे लगता है कि यदि कोई भाषा वैज्ञानिक इस पर गौर करे तो उसे एक चुनावी डिक्शनरी तैयार करने में मदद मिलेगी। इतना ही नहीं उसे मेहनत की जरुरत भी नहीं पड़ेगी। न ही किसी को साभार कहना पड़ेगा बल्कि कोई पब्लिकेशन वाला हाथ जोड़कर छापने के लिए तैयार हो जाएगा। वह डिक्शनरी हाथोहाथ बिक भी जाएगी। उस डिक्शनरी की डिमांड राजनेता से लेकर फिल्मी दुनिया के लोगों को अधिक रहेगी। अाप चाहे तो इन शब्दों का पेटेंट करा लो तो कोई यह नहीं कह पाएगा की ये चोरी का शब्द है। लालू के हर शब्दों पर फिल्म बन जाएगी। मोदी के हर वाक्य हर राजनीतियों के जुबान पर होगी। नीतीश का हर जुमला बचाव पक्ष का हथियार बन जाएगा। यदि अाप लोगों को लग रहा है कि व्यंग छूट रहा है तो राजनीति के कुवांरे भाई राहुल के शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं। 

Wednesday, January 11, 2012

इंटरनेट, सोशल नेटवर्किंग साइट्स और ब्लॉग

इंटरनेट और ब्लॉग के प्रादुर्भाव ने पत्रकारिता में बड़े परिवर्तन का द्वार खोला है। अभी कुछ समय पूर्व तक ‘खबर’ वह होती थी जो अखबार में छप जाए या रेडियो-टीवी पर प्रसारित हो जाए। परंतु अब इंटरनेट न्यूज़ वेबसाइट्स और ब्लॉग की सुविधा के बाद तो एक क्रांति ही आ गई है। न्यूज़ बेवसाइट्स ने छपाई, ढुलाई और कागज का खर्च बचाया तो ब्लॉग ने शेष खर्च भी समाप्त कर दिए। ब्लॉग पर तो समाचारों का प्रकाशन लगभग मुफ्त में संभव है।
आज लगभग हर पत्रकार ईमेल का प्रयोग करना जानता है। लेकिन अभी भी बहुत से संवाददाता ऐसे हैं जो इंटरनेट में ईमेल से आगे नहीं बढ़ पाये। आपको जो समाचार ईमेल के माध्यम से मिल जाता है, उसमें कंपोज़िगं का समय तो बचता ही है, उसका संपादन और प्रूफ शोधन भी आसान बात है। परंतु इंटरनेट का उपयोग इतने तक ही सीमित नहीं है। इंटरनेट एक बहुत उपयोगी साधन है और यदि आप इंटरनेट का ढंग से उपयोग कर सकें तो यह आपकी प्रगति के कई दरवाजे खोल सकता है। इटंरनेट ज्ञान का भंडार है। इंटरनेट से आपको खबरों के कई नये स्रोत मिल सकते हैं, नये नज़रिये से चीजों को देखने की दृष्टि मिल सकती है और काम की गति बढ़ सकती है। इटंरनेट पर अंग्रेजी ही नहीं, हिंदी में भी बहुत-सी उपयोगी सामग्री उपलब्ध है जिससे लाभ उठाया जा सकता है। इसी तरह सरकारी विभागों की वेबसाइटों पर बहुत-सी उपयोगी जानकारी बिखरी पड़ी है जो अपने आप में समाचारों का भंडार हैं। यही नहीं, देश का लगभग हर बड़ा हिंदी अखबार इंटरनेट पर उपलब्ध है। इसका लाभ है कि इंटरनेट के प्रयोग से आप देश के दूर-दराज से छपने वाले हिंदी अखबार में छपने वाली हर सामग्री घर बैठे पढ़ सकते हैं और उसके लिए आपको अखबार खरीदने तक की आवश्यकता नहीं । यही नहीं, आप अपने समय की सुविधा के अनुसार जब चाहें, अखबार का ऑनलाइन संस्करण पढ़ सकते हैं और उसमें से अपने मतलब की खबरें देख ले सकते हैं।
बहुत से न्यूज़ पोर्टल (समाचारों की वेबसाइट) सिर्फ इंटरनेट संस्करण देने वाले ही हैं, यानी, वे ऐसे समाचारपत्र हैं जो सिर्फ इंटरनेट पर ही उपलब्ध हैं। हिंदी में समाचार4मीडिया.कॉम ऐसे ही ऑनलाइन समाचारपत्र के उदाहरण हैं। इसी तरह सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटें और ब्लॉग भी न केवल ज्ञान का भंडार हैं बल्कि बहुत से समाचार तो इन्हीं वेबसाइटों और ब्लॉग से निकलते हैं। आज भिन्न-भिन्न सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटें और ब्लॉग इतने लोकप्रिय और प्रभावशाली हैं कि उनमें लिखी बातें समाचार बनती हैं। अब ब्लॉग समाचार से पीछे नहीं हैं, समाचारपत्र और टीवी चैनल ब्लॉग के पीछे चलते हैं। फिल्मी गपशप में रुचि रखने वाले लोगों के लिए अमिताभ बच्चन का शाहरुख खान, आमिर खान, आदि फिल्मी हस्तियों के ब्लॉग समाचारों का बड़ा स्रोत हैं। ये अपने ब्लॉग पर जो लिखते हैं, वह खबर बन जाता है।
केंद्र सरकार में मंत्री बनने के बाद शशि थरूर ने हवाई जहाज की इकॉनमी क्लास को ट्विटर नामक सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर ‘कैटल क्लास’ बताकर मुसीबत मोल ले ली और उन्हे माफी मांगकर ही छुटकारा मिला।
क्या है ब्लॉग ?
ब्लॉग अंग्रेजी के शब्द वेब-लॉग का छोटा रूप है जिसका अर्थ है इंटरनेट पर प्रकाशित डायरी। इसकी सबसे ताज़ा प्रविष्टि, यानी एंट्री (जिसे ब्लॉग के प्रयोक्ता ‘पोस्ट’ कहते हैं, क्योंकि एंट्री पोस्ट की जाती है यानि ब्लॉग पर प्रकाशित की जाती है ) ब्लॉग के होम पेज या मुख्य पृष्ठ पर होती है तथा शेष पुरानी प्रविष्टियां पुराने अभिलेखों यानी आर्काइव्स में शामिल हो जाती हैं। होमपेज पर आर्काइव्स का लिकं रहता है जहां से आप पुरानी प्रविष्टियों को देख सकते हैं। पुरानी प्रविष्टियां तिथि और विषय के अनुसार वर्गीकृत की जा सकती हैं। यानी, आप राजनीतिक विषय की प्रविष्टियां अलग कर सकते हैं और फिल्म के संबंध में लिखी गई प्रविष्टियां अलग रख सकते हैं। इसी प्रकार अलग-अलग तिथियों की प्रविष्टियों को अलग-अलग रखा और ढूंढ़ा जा सकता है। ब्लॉगर चाहे तो पाठक हर प्रविष्टि पर अपनी टिप्पणियां दे सकते हैं, दूसरों की टिप्णियां पढ़ सकते हैं और दूसरों की टिप्पणियों पर भी टिप्पणी कर सकते हैं।
आपके पास इंटरनेट का कनेक्शन हो तो आप विश्व भर में कहीं भी हों, अपने ब्लॉग पर आप नई प्रविष्टि डाल सकते हैं। आप अपनी प्रविष्टि को टाइप करते हैं, उसके प्रकाशित करने के बटन को क्लिक करते हैं और दुनिया भर के लोग उसे देख सकते हैं। यह अत्यंत आसान काम है।
ब्लॉग विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो वेब डिज़ाइनिंग अथवा इसकी कूट भाषा यानी एचटीएमएल कोडिंग नहीं जानते और सीखना भी नहीं चाहते । यदि आप ईमेल का प्रयोग जानते हैं तो ब्लॉग बनाना आपके बांये हाथ का खेल है। उसमें कुछ भी नया सीखने की आवश्यकता नहीं है।
ब्लॉग का ढांचा
ब्लॉग की उपयोगिता समझने के बाद, आइये हम ब्लॉग के ढांचे अथवा इसके आवश्यक तत्वों के बारे में भी कुछ जान लें।
शीर्षक एवं टैग लाइन
आपके ब्लॉग का शीर्षक जितना ही स्पष्ट होगा, लोगों को आपके ब्लॉग की प्रकृति समझने में उतनी ही आसानी होगी तथा उस विषय में रुचि रखने वाले पाठकों को आपका ब्लॉग ढूंढ़ने में उतनी ही आसानी होगी तथा आपके ब्लॉग पर आने वाले लोगों की संख्या उतनी ही ज्यादा होगी। आपको अपने ब्लॉग के शीर्षक में ब्लॉग शब्द जोड़ने की आवश्यकता नहीं है। यदि आपके ब्लॉग का शीर्षक और टैग लाइन आपके ब्लॉग के विषय की व्याख्या करते होंगे तो इंटरनेट के सर्च इंजन के माध्यम से नये पाठक आपके ब्लॉग तक आसानी से पहुंच सकेंगे।
प्रविष्टियां
ब्लॉग में आप एक विषय पर जो कुछ भी लिखते हैं, वह एक प्रविष्टि है। आप एक ही दिन में कितनी ही प्रविष्टियां कर सकते हैं, या कई दिनों तक एक भी प्रविष्टि न करें, यह आपकी इच्छा और सुविधा पर निर्भर करता है। सबसे ताज़ा प्रविष्टि मुख्य पृष्ठ पर रहती है और जैसे-जैसे आप नई प्रविष्टियां जोड़ते चलते हैं, पुरानी प्रविष्टियां पुराने अभिलेखों में शामिल होती जाती हैं।
पर्मालिंक
कई ब्लॉग की प्रविष्टियों के अंत में आपको पर्मालिंक का बटन मिलेगा। पर्मालिंक वस्तुतः पर्मानेंट लिंक का छोटा रूप है जो एक स्थाई संपर्क सूत्र है जिससे आप किसी खास प्रविष्टि को जब चाहें तब देख सकते हैं। मान लीजिए कि आपने मेरे ब्लॉग की किसी प्रविष्टि को पर्मालिंक से जोड़ दिया, जो उस समय मेरे ब्लॉग के मुख्यपृष्ठ पर थी। अब जैसे-जैसे मैं नई प्रविष्टियां डालती जाऊंगी, पहले वाली प्रविष्टि पुरानी होकर अभिलेखों में शामिल हो जाएगी। यदि आप सिर्फ मेरे ब्लॉग के होम पेज पर लिंक लगाएंगे तो जो व्यक्ति आपके ब्लॉग या वेबसाइट से उस लिंक पर क्लिक करेगा, वह मेरे ब्लॉग के होमपेज अथवा मुख्यपृष्ठ पर पहुंचेगा, और उसे उस विशिष्ट प्रविष्टि को तलाश करना पड़ेगा। परन्तु यदि आप मेरे ब्लॉग की किसी प्रविष्टि को पर्मालिंक से जोड़ेंगे तो जो भी व्यक्ति उस लिंक पर क्लिक करेगा, वह सीधे वांछित प्रविष्टि पढ़ सकेगा। इसे आप यूं समझ सकते हैं कि मेरे ब्लॉग की हर प्रविष्टि का अपना अलग वेब पेज या वेब-एड्रेस होगा। यह कहने के बजाए कि सुप्रिया मिश्रा के ब्लॉग के होमपेज पर जाइए, नवंबर माह की चौथी तारीख की सातवी प्रविष्टि देखिए, आप सीधे उस प्रविष्टि को पर्मालिंक से जोड़ सकते हैं औऱ लिंक क्लिक करने पर हर बार सीधे वही प्रविष्टि खुलेगी, उसे ढूढने के लिए अलग मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।
टिप्पणियां
हर ब्लॉग विभिन्न प्रविष्टियों से बनता है, यानी एक ब्लॉग कुछ या कई प्रविष्टियों का जोड़ है और यदि आप चाहें तो, आप अपने ब्लॉग की प्रविष्टियों पढ़ने वाले पाठकों को यह सुविधा दें कि वे उस पर अपनी टिप्पणियां भी छोड़ सकते हैं।
ब्लॉग में लोगों की रुचि का एक बड़ा कारण यह भी है कि इस तरह से आप पाठक की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर लेते हैं। यदि आप कोई न्यूज़लेटर ईमेल करते हैं तो लोग अपनी राय आपको ईमेल कर सकते हैं, पर वह राय आपके और उस पाठक के बीच ही सीमित रहेगी। अन्य लोग उसे नहीं देख सकते। ब्लॉग में यह सीमा नहीं है। हर व्यक्ति आपकी प्रविष्टि पर अपनी राय दे सकता है, उसके बाद आपकी प्रविष्टि देखने वाले लोग न केवल आप की प्रविष्टि देख सकते हैं बल्कि उस पर दर्ज टिप्पणियां भी देख सकते हैं। वे आपकी प्रविष्टि पर अपनी अलग टिप्पणी दर्ज कर सकते हैं, टिप्पणी पर टिप्पणी दर्ज कर सकते है, और आपकी प्रविष्टि तथा टिप्पणी दोनों पर एक साथ या अलग-अलग राय दर्ज कर सकते हैं। आपके पाठक आपसे सहमत हो सकते हैं, असहमत हो सकते हैं, उसमें कुछ नया जोड़ सकते हैं और यह सुझाव भी दे सकते हैं कि उस विषय पर और अधिक जानकारी कहां से पायी जा सकती है।
यह आप पर निर्भर करता है कि आप लोगों को टिप्पणी की सुविधा दें या न दें। टिप्पणी आ जाने के बाद भी ब्लॉग के रचयिता के तौर पर आप किसी टिप्पणी को संपादित कर सकते हैं, हटा सकते हैं या ज्यों का त्यों प्रकाशित कर सकते हैं। आप यह भी कर सकते हैं कि कुछ विशिष्ट प्रविष्टियों पर टिप्पणी न की जा सके। यही नहीं, यह भी आपके हाथ में है कि आप की प्रविष्टियों पर की जाने वाली टिप्पणियां पहले आप देखें, और जो टिप्पणी आप प्रकाशित करना चाहें, सिर्फ वही टिप्पणी लोगों को दिखाई दे।
पुरानी प्रविष्टियां (अभिलेख या आर्काइव्स)
ब्लॉग की एक और बड़ी खासियत यह है कि जैसे-जैसे आप नई प्रविष्टियां जोड़ते चलते हैं, पुरानी प्रविष्टियां अपने आप आपके अभिलेखागार यानी रिकार्ड रूम में इकट्ठी होती चलती हैं और उनका वर्गीकरण होता चलता है। वेबसाइट में यदि आप कुछ जोड़ना चाहें तो अपने वेब डिज़ाइनर के बिना आप ऐसा नहीं कर सकते, जबकि ब्लॉग का सॉफ्टवेयर आपके लिए खुद-ब-खुद यह काम करता है। इससे पुरानी प्रविष्टियों को ढूंढ़ने में आसानी रहती है क्योंकि तब आप किसी खास विषय पर लिखी गई अथवा किसी खास तारीख को लिखी गई प्रविष्टि तक आसानी से पहुंच सकते हैं।
ब्लॉगर या ब्लॉग के रचयिता के बारे में सूचना
ब्लॉगर या ब्लॉग का रचयिता अपने ब्लॉग पर अपने बारे में वांछित जानकारी रुचिकर ढंग से दे सकता है। इससे आपको व्यक्तिग रूप से न जानने वाले नये पाठकों को भी आपकी रुचियों और उपलब्धियों की जानकारी मिलती है।
ब्लॉगरोल
ब्लॉग बनाने वाले ज्यादातर लोग अपने ब्लॉग के साथ ब्लॉगरोल भी बनाते हैं। ब्लॉगरोल, ब्लॉग के लेखक की पसंदीदा वेबसाइटों और ब्लॉगों की सूची मात्र है। ब्लॉगरोल में दी गई वेबसाइटों और ब्लॉगों को क्लिक करने से आप उन वेबसाइटों अथवा ब्लॉगों तक भी पहुंच सकते हैं औऱ आपको उनसे बहुत सी नई जानकारी मिल सकती हैं।
फीड सुविधा
ब्लॉग में एक अनूठी सुविधा है। आपको अक्सर ब्लॉग पर एक लिंक मिलेगा जो कहता है ‘इस ब्लॉग की प्रविष्टियों को सब्सक्राइब कीजिए, अर्थात उन्हें नियमित रूप से पाने की सहमति दीजिए।’ यदि आप किसी ब्लॉग के ऐसे लिंक पर क्लिक करते हैं तो उस ब्लॉग की हर नयी प्रविष्टि की सूचना आपको खुद-ब-खुद ईमेल से मिलती रहेगी। इससे आपको उस ब्लॉग पर बार-बार जाकर यह देखने की आवश्कता नहीं रहती कि ब्लॉग के लेखक या रचयिता ने उसमें कोई नयी प्रविष्टि डाली या नहीं, क्योंकि एक बार फीड सब्सक्राइब कर लेने पर नयी प्रविष्टियों की सूचना आपको खुद-ब-खुद मिलती रहेगी।
इन सुविधाओं की सूची से ही आप जान गये होंगे कि ब्लॉग की लोकप्रियता क्यों बढ़ रही है। ब्लॉग अपने संपर्क बढ़ाने का, व्यवसाय बढ़ाने का, किसी एक मत के प्रचार का एक बड़ा और सुविधाजनक साधन है। ब्लॉग बनाने के लिए आपको इंटरनेट कनेक्शन वाला कंप्यूटर और ब्लॉग लिखने की इच्छा चाहिए। इतने कम खर्च से आप दुनिया भर तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं। इसी फर्क ने पुराने ज़माने के पत्रकारों का विशेषाधिकार छीन लिया है और इसी कारण से सिटिजन जर्नलिज़्म को बढ़वा मिला है। इसके परिणाम कुछ भी हों, पर ब्लॉग एक ऐसी सुविधा है जिसने पत्रकारिता की दुनिया को हमेशा-हमेशा के लिए बदल डाला है।
किसी घटना के घटित होने पर टीवी चैनेल का पत्रकार जब कैमरा सहित घटना स्थल पर पहुंचेगा, फोटो लेगा, खबर रिकार्ड करवायेगा, खबर संपादित होकर प्रसारित होगी, उसमें काफी समय लगता है। यह एक लम्बी प्रकिया है। ब्लॉगर के सामने यह विवशता नहीं है। वह अपने मोबाइल से भी फोटो खींच सकता है, कैमरे से भी और अपनी टिप्पणी सहित अपने ब्लॉग पर डाल सकता है। बहुत सी खबरें पहले ब्लॉग पर आईं, टीवी चैनलों ने उन्हे बाद में प्रसारित किया। अखबारों का मामला तो और भी अलग है। अखबारों में तो नया समाचार अगला संस्करण आने पर ही आ सकता है। इस तरह तकनीक के कंधे पर सवार होकर ब्लॉग ने समाचार पत्रों और टीवी चैनलों को भी एक तरह से पीछे छोड़ दिया है।
एक समाचारपत्र पढ़ने वाला व्यक्ति समाचारपत्र पढ़ते हुए भी कुछ और काम कर रहा हो सकता है, उसका ध्यान भटक सकता है, वह समाचारपत्र पढ़ते हुए फोन पर बात कर सकता है। ब्लॉग का पाठक इस मामले में समाचारपत्र के पाठक से भिन्न है। ब्लॉग का पाठक अक्सर सक्रिय पाठक होता है। और वह जिस ब्लॉग का पाठक है, उससे भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है। यही एक खूबी ब्लॉग की महत्ता को और भी स्पष्ट करती है।
सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटें
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, ये वे वेबसाइटें हैं जहां आप अपना सामाजिक दायरा भी बढ़ा सकते हैं, नये मित्र बना सकते हैं, पुराने मित्रों से संपर्क में रह सकते हैं, आपस में एक-दूसरे को राय दे सकते है, आदि-आदि। ऑर्कुट, टिवटर, बिगअड्डा, यूटयूब आदि ऐसे ही मंच हैं जो सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट हैं। इनकी लोकप्रियता इतनी तेजी से बढ़ी है कि यह खुद ही अपने आप में एक खबर है।
आज हर रोज लगभग दो लाख नये ब्लॉग बनते हैं, लगभग चालीस लाख नयी प्रविष्टियां हर रोज़ दर्ज की जाती हैं। लोग ब्लॉग पढ़कर खुश होते है, हंसते हैं, रोते हैं, कुछ नया सीखते हैं, अपने उत्पादों और सेवाओं की जानकारी देते हैं और नये उत्पादों और सेवाओं की जानकारी लेते हैं, जानकारी बांटते हैं, बढ़ते हैं। यदि आप कुशल पत्रकार बनना चाहते हैं तो ब्लॉग की महत्ता को नज़र अंदाज़ मत कीजिए। दूसरों के ब्लॉग पढ़िए, उनसे दोस्तियां बनाइए, अपना ब्लॉग बनाइए और अपने प्रशंसक वर्ग में इज़ाफा कीजिए। यह समय की जरूरत है, समय की मांग है।
प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के साथ-साथ अब हमारे पास वेब मीडिया जैसा नया विकल्प भी मौजूद है। आज के दौर में हर सचेत नागरिक पत्रकार है। वह अपने विचारों को ब्लॉग के जरिए प्रकट कर सकता है। पत्रकारिता में आने के इच्छुक हर व्यक्ति को अपना ब्लॉग बनाना चाहिए। इससे लिखने का अभ्यास बढ़ता है और आप खुद को तकनीकी रूप से अपग्रेड कर सकते हैं।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि आप जहां तक सोच सकते हैं, इंटरनेट आपको वह सब करने का मौका देता है। अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है, इंटरनेट उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है। सूचना संचार के तीनों माध्यमों, यानी दृश्य, श्रव्य और पाठ को एक ही सूत्र में बांधने वाला इंटरनेट नाम का यह नया माध्यम गति औऱ पहुंच के पैमाने में अतुलनीय है। इंटनेट, ब्लॉग और सोशल नेटवकिंग वेबसाइट्स की असाधारण लोकप्रियता का यही कारण है।
समाचार4मीडिया से साभार

Thursday, December 1, 2011

साध्वी चिदर्पिता की बाते निकली सच स्वामी चिन्मयानंद पर दुष्कर्म व हत्या मामला दर्ज

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानंद के विरूद्ध उनकी एक शिष्या ने दुष्कर्म एवं हत्या के प्रयास के आरोप की प्राथमिकी दर्ज कराई है।

पुलिस सूत्रों ने बताया है कि स्वामी चिन्मयानंद के मुमुक्षक आश्रम की पूर्व प्रबंधक एवं उनकी शिष्या ने शाहजहांपुर के जिला पुलिस अधीक्षक को दो दिन पहले भेजी एक तहरीर में उनके विरूद्ध दुष्कर्म एवं हत्या का प्रयास करने का आरोप लगाया था। उन्होंने बताया कि शिष्या ने बुधवार को जिला पुलिस अधीक्षक कार्यालय में उपस्थित होकर इस संबंध में अपना बयान भी दर्ज कराया, जिसके बाद कोतवाली पुलिस ने चिन्मयानंद के विरूद्ध प्राथमिकी दर्ज कर ली है।

उन्होंने बताया है कि इस मामले की जांच पुलिस निरीक्षक नरेंद्र पाल सिंह को सौंपी गई है। प्राथमिकी के अनुसार, वर्ष 2001 से वह राजनीतिक और आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित करने के लिए स्वामी चिन्मयानंद के दिल्ली आवास पर रह रही थी और उनके साथ अनेक स्थानों की यात्रा कर चुकी है। शिष्या ने आरोप लगाया है कि वर्ष 2005 में स्वामी चिन्मयानंद के निर्देश पर उन्हें मुमुक्षक आश्रम लाया गया, जहां उन्होंने नशीला पदार्थ खिलाकर उसका यौन शोषण किया और सारे कृत्य की वीडियो फिल्म बना ली, जिसके बल पर उसे ब्लैकमेल किया गया और दो बार उसे जबरन गर्भपात भी कराना पड़ा। स्वामी चिन्मयानंद ने बहरहाल उनके विरूद्ध लगे आरोपों को निराधार और राजनीति से प्रेरित बताया है।


Friday, March 11, 2011

सुनामी से मौत का मंजर


६ साल बाद एक फिर सुनामी की याद ताजा हुई । 11 मार्च 2011 जापान के उत्तरी पूर्वी इलाके में ८.९ की तीव्रता के भूकंप के बाद आई सुनामी ने भारी तबाही मचाई है । सबसे ज्यादा तबाही तटीय इलाके में हुई है। सेंडई इलाके में रीब 10 मीटर ऊंची उठी लहरों में कई मकान और गाडिय़ां बह गई। एक बड़ा पोत भी लहरों में बह गया। भूकंप के बाद सुनामी से करीब 200 शव तो सेंडई शहर में मिले थे। अभी कितने लोग मलवे में दबे है या समुद्र में बह गए उसकी जानकारी नही थी। इस खौफनाक मंजर से एक बार फिर दिल दहल गया। 26 दिसम्बर सन् 2004 की वह दिन फिर याद आ गया। जो अनेक सुन्दर जिन्दगियों के लिए खौफनाक मौत का पैगाम लेकर आई। समुद्र की सुनामी लहरों ने मौत का एक ऐसा विकट जाल बिछाया था, जिसमें हजारों लोगों के घर तबाह हो गए थे, हजारों जीवन बर्बाद हो गए थे।
उस समय भूकंप भूक·े कारण धरती की धुरी बुरी तरह से काँपने लगी थी। दुनिया के नक्शे से कुछ द्वीप गायब होने लगे थे तथा कुछ अपनी जगह से खिसकने भी लगे थे। सुनामी लहरों के कारण समुद्र तट पर बसे तमिलनाडु राज्य के तीन नगर—कुडलूर, नागपट्टिनम और वेलांगनी लगभग नष्ट ही हो चुके थे, साठ से ज्यादा ऐसे गाँव थे जिनका पृथ्वी पर कोई नामोनिशान बाकी नहीं रहा था। उन गाँवों को कच्ची-पक्की इमारतें कहाँ गईं—कुछ पता न चल सका। सबको समुद्र की सुनामी लहरें खा गईं। अनेक घर समुद्र की ऊँची-ऊँची लहरों की चपेट में आकर ध्वस्त हो गए। लोग-बाग अपनी जान बचाने के लिए समुद्र की लहरों से डरकर भागे परन्तु वे भागते कहाँ तक ? काल उनके सिर पर मँडराता हुआ, अपने आगोश में ले लिया।
आज जब जापान में सुनामी आयी तो भारत की कल्पना कर दिल कांप गया। इस दैविक आपदा में मारे गए बेकसूर लोग जिसका आज का दिन शुरू होने से पहले खत्म हो गई ।

Saturday, March 5, 2011

meri kalam se: जौनपुर की मशहूर इमरती

meri kalam se: जौनपुर की मशहूर इमरती

जौनपुर की मशहूर इमरती


जमाने में अपने इत्र और सुगंधित तेलों के लिए मशहूर रहे उत्तर प्रदेश के जौनपुर शहर की लजीज ‘इमरती’ अब देश-विदेश में धूम मचा रही है। शहर के नक्खास मुहल्ले के निवासी बेनीराम देवी प्रसाद ने सन 1855 से अपनी दुकान पर देशी घी की ‘इमरती’ बनाना शुरू किया था। उस समय देश गुलाम था फिर भी बेनीराम देवीप्रसाद ने अपनी इमरती की श्रेष्ठता एवं स्वाद बरकरार रखा। बेनी राम देवी प्रसाद के बाद उनके लड़के बैजनाथ प्रसाद, सीताराम व पुरषोत्तम दास ने अपना कारोबार बढ़ाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। इन लोगों ने भी जौनपुर की प्रसिद्ध इमरती की महक बनाए रखी।
इसके बाद विष्णु चन्द, प्रेमचन्द एवं जवाहरलाल ने इमरती को देश के बाहर भेजने का काम शुरू किया। अब जौनपुर की प्रसिद्ध इमरती को बेनीराम देवी प्रसाद की चौथी पीढ़ी के वंशजों रवीन्द्रनाथ, गोविन्, धर्मवीर एवं विशाल ने पूरी तरह से संभाल लिया है। जौनपुर की प्रसिद्ध इमरती की खासियत यह है कि यह हरे उड़द, देशी चीनी और देशी घी से लकड़ी की आंच पर ही बनाई जाती है। उड़द की दाल को सिल-बट्टे से पिसवाया जाता है।इमरती के लिए देशी चीनी आज भी बलिया से मंगाई जाती है। देशी चीनी और देशी घी में बनने के कारण इमरती गरम होने और ठंडी रहने पर भी मुलायम रहती है। बिना फ्रिज के इस इमरती को कम से कम दस दिन तक सही हालत में रखा जा सकता है। जौनपुर की प्रसिद्ध इमरती 153 वर्ष पुरानी हो चुकी है और उसका स्वा और गुणवत्ता अभी भी बरकरार है। जौनपुर से जो भी व्यक्ति अपनी रिश्तेदारी या मित्रों के यहां जाता है वह यहां की प्रसिद्ध बेनी की इमरती जरूर ले जाता है।
संसद में भी बंटी इमरती
स्वामी चिन्मयानंद जब जौनपुर से सांसद चुनकर गए तो वरिष्ठ भाजपा कलराज मिश्र के भतीजे ब्रह्मदेव मिश्र ने कई किलो इमरती लेकर दिल्ली गए। वह इमरती संसद भवन में बंटा गया । सांसदों ने स्वामी जी से पूछा की इस इमरती का नाम तो बहुत सुने थे इसका खासियत क्या है तो स्वामी जी ने तपाक से कहा की यह तो मुरली मनोहर जोशी ही बता सकते है क्योकि जोशी जी (इलाहाबाद) का पडोसी जिला जौनपुर है। जोशी जी ने कहा की मै भी बहुत नहीं जनता लेकिन इतना जरुर जनता हूँ कि यह गरम में भी नरम और नरम में भी नरम यानि ठंडे में भी नरम रहता है । जोशी जी के बात पर पूरा सदन ठहाका लगाया।

Monday, January 24, 2011

पेड न्यूज की प्रवृत्ति जटिल समस्या


पेड न्यूज की प्रवृत्ति को एक जटिल समस्या करार देते हुए चुनाव आयोग ने २४ जनवरी २०११ को नईदिल्ली में कहा कि इसे मीडिया और राजनीतिक दलों द्वारा स्व नियमन के जरिए हल किया जा सकता है।

मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने २४ जनवरी को कहा कि चुनाव आयोग पेड न्यूज के माध्यम से मतदाताओं के मन पर पड़ने वाले अनुचित प्रभाव को लेकर चिंतित है। सही और निष्पक्ष सूचना पाने के मतदाताओं के अधिकार के संरक्षण की आवश्यकता है। कुरैशी ने राष्ट्रीय मतदाता दिवस और चुनाव आयोग की हीरक जयंति के समापन समारोह से एक दिन पहले यहां आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में कहा कि हमारा अनुमान है कि पेड न्यूज की समस्या को मीडिया और राजनीतिक दलों द्वारा स्व विनियमन के जरिए बेहतर तरीके से निपटा जा सकता है। उन्होंने पेड न्यूज के मामलों की जांच के लिए किए जा रहे उपायों की चर्चा करते हुए कहा कि आयोग ने सतर्कता प्रकोष्ठों का गठन किया है जो प्रकाशित और प्रसारित होने वाली खबरों पर कड़ी नजर रखते हैं। उन्होंने कहा कि हमने नोटिस जारी किए हैं और शिकायतों की सुनवाई शुरू की है। उन्होंने बताया कि हाल में एक राज्य में हुए विधानसभा चुनाव के बाद 86 नोटिस जारी किए गए। कई उम्मीदवारों ने आरोप को स्वीकार किया और पेड न्यूज पर हुए खर्च को चुनाव आयोग को दाखिल किए जाने वाले अपने विवरण में शामिल किया। हालांकि यह बस एक शुरूआत मात्र है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनाव प्रबंधकों द्वारा मतदाताओं को शिक्षित करने के काम को प्राथमिकता दिए जाने की आवश्यकता और भारतीय चुनावों में धनबल की बढ़ती भूमिका पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने चुनावों में धनबल के इस्तेमाल पर चिंता जताते हुए कहा कि यद्यपि चुनाव आयोग ने इस मामले में ढेर सारे उपाय किए हैं और उसे काफी सफलता भी मिली है फिर भी चुनावों में यह बड़ा मुद्दा बना हुआ है। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव में एक उम्मीदवार के लिए पच्चीस लाख रुपये और विधानसभा चुनाव में दस लाख रूपए खर्च करने की अधिकतम सीमा तय है लेकिन गैर सरकारी अनुमानों के मुताबिक उम्मीदवार द्वारा इससे कई गुना ज्यादा राशि खर्च की जाती है।

कुरैशी ने बताया कि कुछ महीने पहले ही चुनाव आयोग में उम्मीदवारों द्वारा खर्च की जाने वाली राशि पर नजर रखने के लिए एक अलग विभाग बनाया गया है। उन्होंने कहा कि धन बल के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए हमारा संघर्ष जारी है, रास्ता लंबा है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनावों में मतदाताओं की हिस्सेदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि चुनाव प्रबंधकों ने मतदाता शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दी है और चुनावी प्रक्रिया के प्रति शहरी लोगों और युवाओं की उदासीनता से निपटे जाने की जरूरत है। दैनिक जागरण से साभार

Thursday, December 23, 2010

विकीलीक्स’ ने खोजी पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया है


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‘विकीलीक्स’ वेबसाइट आज किसी परिचय की मोहताज नहीं रही। इसने एक ऐसी वेबसाइट के रूप में ख्याति पाई है जिसने न सिर्फ दुनिया की दशा और दिशा तय करने वाले देश की राजनीतिक जड़ों को हिला कर रख दिया है बल्कि डिजिटल मीडिया के नए ताकतवर अवतार को भी दुनिया के सामने रखा है। यह परंपरागत मीडिया से कहीं ज्यादा प्रभावशाली और कम समय में पाठकों तक समाचार पहुंचाने का माध्यम बनकर भी उभरा है।
लेकिन इसने कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। मीडिया के क्षेत्र में यह नयी ताकत के रुप में उभरा है साथ में नया खतरा भी। क्या यह डिजिटल मीडिया के लिए एक नया अवसर नहीं है? यह सवाल भी खड़ा होता है कि जब इस तरह के दस्तावेज मीडिया के सामने हों तो पहले देशहित है या जनहित। सबसे अहम सवाल यह है कि ‘विकीलीक्स’ की तरह कोई वेबसाइट अगर भारत में काम करने लगे तो उसका अंजाम क्या होगा?
वेबसाइट पर खुलासे पहले भी हो चुके हैं
साइबर पत्रकार, पीयूष पाण्डे के अनुसार, “डिजीटल मीडिया में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब किसी साइट ने बड़े खुलासे किए हों। propublic.org (प्रोपब्लिकाडॉटओआरजी) को तो पुलित्जर अवॉर्ड भी मिल चुका है। ‘तहलका’ भी मैच फिक्सिंग और रक्षा सौदों में दलाली का सनसनीखेज खुलासा कर चुकी है। लेकिन, ‘विकीलीक्स’ ने खोजी पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया है। ‘विकीलीक्स’ ने खोजी पत्रकारिता को तथ्यों के साथ परोसा और दुनिया के कई मुल्कों की राजसत्ता से जुड़े गड़बडझालों को सामने रखा।”
प्रवीण साहनी के अनुसार, “बदलते दौर में, समय की कमी और नेट फ्रेंडली समाज के लिए डिजिटल मीडिया एक अवसर लेकर आया है। यहां हम यह भी बताते चलें कि nnilive.com (एनएनआई लाइव डॉट कॉम) का कॉन्सेप्ट भी इसी पर आधारित है। हमने भी, ललित मोदी पर ड्रग्स रखने संबंधी एफआईआर की कॉपी के अलावा कुछ अन्य दस्तावेज उसी रूप में प्रकाशित किया था।”
‘वेबदुनिया’ कंटेंट हेड, जयदीप कर्णिका ने कहा, “विकीलिक्स ने जो तहलका मचाया है वो उन सूचनाओं के आधार पर मचाया है जो बहुत गोपनीय थीं और सार्वजनिक रूप से उजागर कर दी गईं। ये अलग तरह की पत्रकारिता जरूर है लेकिन मैं इसे अलग तरह का मीडिया नहीं मानूंगा। वो इसलिए की मीडिया में आज भी संपादक नाम की संस्था अस्तित्व में है।”
भारतीय डिजिटल मीडिया पर इसका प्रभाव
‘समयलाइव.कॉम’ के हेड, पाणिनी आनंद ने कहा कि “भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि यहां पर ऐसी वेबसाइट नहीं आ सकती है। लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी एडिटोरियल कॉल को लेने वालों की होती है जो विश्वनीयता,पारदर्शिता और निष्पक्षता-पूर्व ऐसे दस्तावेजों को पाठकों के सामने लाये। ‘विकीलीक्स’ से ख़बरें निकल रही है वो दुनिया के शक्तिशाली राज्यों के बारे में बात कर रही हैं। ‘विकीलिक्स’ की बटुली से अभी कुछ ही चावल निकले हैं अभी पूरा भात निकलना बाकी है, न जाने उन चावलों पर अभी किन-किन देशों का नाम लिखा हुआ है।”
साइबर पत्रकार, पीयूण पाण्डे के अनुसार, “डिजीटल मीडिया खुद अपनी जगह बना रहा है और जल्द ही इसकी गुणवत्ता और ब्रांडिंग इस तरह की होगी कि सभी लोग इससे जुड़ना चाहेंगे। ‘विकीलीक्स’ जैसी साइट कहीं भी आए, उसे विरोध झेलना ही पड़ेगा क्योंकि राजसत्ता कहीं की भी हो, वो अपने खिलाफ लगातार वार सहन नहीं कर पाती।”
‘वेबदुनिया’ कंटेंट हेड, जयदीप कर्णिका ने कहा, “डिजिटल मीडिया की सबसे बड़ी दिक्कत है, विश्वसनीयता की। जानकारी की अधिकता है और ऐसे में सही जानकारी तक पहुंचना कठिन है। दूसरा है पहुंच। राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों से संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक करना गलत है, लेकिन जूलियन असांज ने जो किया वो इस सबसे कहीं आगे है.... वो राष्ट्र की सीमाओं से परे जाकर उठाया गया कदम है और इसके वास्तविक प्रभावों तक पहुंच पाने में अभी समय लगेगा...।”
समाचार4मीडिया।कॉम से साभार

Saturday, October 23, 2010

विदेशी समाचार-पत्रों का प्रवेश


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कुलदीप नैयर, वरिष्ठ पत्रकार
भारत में विदेशी समाचार-पत्रों का प्रवेश एक ही ऐसा विषय है, जिसने एक ऐसी ही अनुक्रिया को जन्म दिया है। वह या तो बहुत भावात्मक है या फिर बहुत कारोबारी है। यह वाद-विवाद इस अर्थ में अवास्तविक है कि मध्यम और छोटे समाचार-पत्र,जो कि हमारे देश अधिसंख्यक है, इस वाद-विवाद में कही भी दिखाई नहीं देते। वस्तुत: ऐसा प्रतीत होता है कि लड़ाई बड़े समाचार-पत्रों के एक समुच्चय और दूसरे समुच्चय के बीच की है। यह वाद-विवाद तब पैदा हुआ, जब एक समाचार-पत्र के साथ भारत से उसका एक सहकालिक संस्करण आरंम्भ करने का अनुबंध किया । कुछ अन्य लोगों ने उसका अनुकरण किया और समाचार-पत्रों के कुछ अन्य विदेशी समूहों के साथ अनुबंध किया, जबकि इस बिषय पर केद्रिय शासन का अनुमोदन प्रतीक्षित था (वह अस्वीकार कर दिया गया है) एक समाचार पत्र उच्च न्यायालय जा पहुंचा और उसने इस तर्क पर स्थगन आदेश अभिप्राय कर लिया कि यदि किसी विदेशी समाचार पत्र को उसी नाम से, जो कि उसने भारतीय समाचार पत्रों के रजिस्ट्रार से अभिप्राप्त किया है, हमारे देश में समाचार पत्र प्रकाशित प्रकाशित करने की अनुमति दी जाती है तो इससे उसके द्धारा अभिप्राप्त नाम का अतिक्रमण होगा। यदि यह वाद-विवाद शीर्षक या नाम तक ही सीमित होता ते उसका समाधान किया जा सकता था। आखिरकार अनेक समाचार-पत्र विशिष्ट नाम हथिया लेते हैं और वे समाचार-पत्र प्रकाशित नहीं होते। यदि वे प्रकाशित होते भी हैं तो वे नियमित नहीं होते। ऐसा प्रतीत होता है कि आरंभ से ही विवाद का विषय यह था कि विदेशी समाचार-पत्रों को भारत में प्रवेश करने दिया जाना चाहिए या नहीं।
समर्थकों ने भी और विरोधियों ने भी बहुत से मुद्दें उठाए हैं, किंतु प्रमुख मुद्दें दो ही हैं। समर्थकों द्वारा उठाया गया एक मुद्दा यह है कि क्या भारतीय समाचार पत्र प्रतियोगित से डरते हैं, जो कि किसी भी आर्थिक सुधार के लिए बुनियादी चीज होती है। यह एक वजनदार तर्क है, किंतु उसमें विश्वसनीयता का अभाव है, क्योंकि भारत में लगभग 12000 दैनिक समाचार-पत्र और विभिन्न विचारधाराओं और उद्देश्यों वाली अनेक अन्य पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है, जो कि एक-दूसरे के साथ प्रतियोगिता कर रहे हैं। वस्तुत: हर इंच क्षेत्र के लिए लड़ते हैं और प्रसार में अपने प्रतिस्पर्धी को दबाने के लिए सभी प्रकार के तौर-तरीके अपनाते हैं, जिसमें अनैतिक तौर-तरीके भी शामिल होते हैं।
वास्तविक मुद्दा यह है कि हम इस बात पर विचार करें कि विदेशी समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं से हमें कौन-सी क्षति हो सकती है। वे हमारे देश में पहले से ही उपलब्ध हैं, हालांकि उनका मूल्य अत्यधिक है। अपने विशाल संसाधन के बल पर वे एक अस्वस्थ प्रतियोगिता को जन्म दे सकते हैं। वे वर्तमान मूल्य को कम कर सकता है। भारी-भरकम आकार दे सकते हैं, जो कि एक समाचार-पत्र के रूप में भी खरीददार के लिए एक आकर्षक प्रस्ताव होगा।
यह हो सकता है कि विदेशी समाचार-पत्र, जो आधुनिकतम प्रौधोगिकी प्रदान कर सकते हैं, उससे भारतीय समाचार-पत्रों के पलायन से पड़ेगा, क्योंकि विदेशी समाचार-पत्रों से मिलने वाली मोटी तनख्वाहों और परिलब्धियों के आकर्षण से वे अपरहार्यत: विदेशी समाचार-पत्रों की ओर आकर्षित होंगे। यह पलायन हमारे देश के भीतर होने वाला प्रतिभा पलायन होगा।
यह सब उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितनी कि महत्वपूर्ण वह तबाही है, जो कि उनके हाथों हमारी घरेलू राजनीति की होगी। कुछ लोग अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करेंगे। उनकी अभिवृत्तियां देश के लिए बिरले ही अनुकूल रही हैं। तृतीय विश्व पर दिए जाने वाले सीधे-सीधे संवाद में भी वे कोई दृष्टिकोण बेचना चाहते हैं। भारत में किसी समाचार-पत्र या पत्रिका का लोगों पर, लोगों के विचारों पर और लोगों के व्यवहारों पर बहुत प्रभाव होते है, वे लोगों का मार्गदर्शन करते हैं। रेडियो और टीवी के कार्यक्रमों का प्रभाव अस्थायी होता है, जबकि समाचार-पत्रों में छपने वाली सामग्री का प्रभाव स्थायी होता है। उसे विशेषत: ग्रामीण क्षेत्रों में जहां कि अस्सी प्रतिशत लोग रहते हैं, धर्म ग्रंथों में लिखित सत्य वचन के रूप में माना जाता है। क्या विदेशियों को, जो कि भारत के लोकाचार से अनभिज्ञ हैं और हमारे राष्ट्रीय हितों के प्रति शत्रुतापूर्ण भी हो सकते हैं। ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति दी जानी चाहिए, जहां के लोगों को बाहरी प्रभाव सारभूत रूप से प्रभावित करते हैं। वे कतिपय ऐसे विवादों को पुनरुज्जीवितकर सकते हैं, जो कि आज शांत हैं। उनके लेखन संदिग्ध होंगे हमारे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप माना जा सकता है। भारत लोगों को ही यह निर्णय करना चाहिए कि किस प्रकार के भारत का निर्माण किया जाना जाना है। हम गलतियां करेंगे, किंतु वे गलतियां हमारी अपनी होंगी।
अन्यथा कहीं तो रेखा खींचनी ही होगी। यह बात भले ही अटपटी लग सकती है, किंतु जनमत को आकार देने का उत्तरदायित्व उन लोगों को ही सौंपा जाना चाहिए, जो लोग देश के कार्यों में आंतरिक रूप से अंतर्ग्रस्त हैं, न कि मात्र वित्तीय रूप में। वस्तुत : यह मांग कभी भी नहीं रही हैं कि विदेशियों को भारत में राजनीतिक दल आरम्भ करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
विदेशी समाचार अभिकरण भी निर्दोष नहीं है। जनता सरकार के शासनकाल में समाचार अभिकरणों के पुनर्गठन के लिए गठित समीति ने यह कहा खा कि विदेशी समाचार अभिकरणों के समाचार प्रोपेगंडा से परिपूर्ण होते हैं। उनकी समाचार सामग्री से धारणा बनती है मानो कि वे अपने विदेश कार्यालय के विस्तार हों। यह समीति इस निष्कर्ष पर पहुंची कि विदेशों के समाचार देने के लिए भारत के पास उसका पना समाचार अभिकरण होना चाहिए, ताकि पाठकों को अधिक वस्तुनिष्ठ समाचार उपलब्ध हो सकें। पिछले पंद्रह सालों से यह प्रस्ताव लटका हुआ है।
विदेशी समाचार पत्रों को भारत में प्रवेश देने में एक और भी अड़चन है।
संविधान के अनुच्छेद-19 में यह कहा गया है कि सभी नागरिक को वाणी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। अनुच्छेद-5 में दी गई परिभाषा के अनुसार नागरिक का अर्थ है वह भारतीय, जो कि जन्म, अधिवास आदि से नागरिक हो। जैसा कि उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय में कहा गया है, किसी स्वतंत्र देश के नागरिक की परिस्थिति में अंतर्निहित प्राकृतिक अधिकारों का प्रयोग विदेशियों द्वारा नहीं किया जा सकता है।
कुछ लोग अनुच्छेद-19 को विश्वव्यापीकरण के विपरीत मान सकते हैं, किंतु यह बात तृतीय विश्वस के देशों में जीतनी सच हैं, उतनी ही सच विकसित देशों में भी है। मीडिया मुगल रूपर्ट मडार्ख को भी अमेरिका में एक टीवी नेटवर्क का स्वामी बनाने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका को राष्ट्रिक बनना पड़ा। सॉनी कंपनी को, जिसने सी.बी.एस में सारभूत संख्या में शेयर अर्जित कर लिए, अमरीकियों को यह आश्वासन देकर शांत करना पड़ा कि वह अमरीकी लोगों पर जापानी संस्कृति नहीं थोपेगी। यह तर्क उचित नहीं है कि समाचार-पत्र व्यवसाय एक उद्योग है। समाचार-पत्र इस्पात, कपड़े या पटसन जैसा कोई उत्पाद नहीं हैं। वह समाचारों और दृष्टिकोणों प्रत्ययों और विचारों का सहवर्तन है। वह कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं है, जिसमें एक सिरे पर कच्चा माल भर देने पर दूसरे सिरे से कोई तैयार माल निकल आए। लेखन, सृजनशीलता है, न कि स्वचालित क्रिया है।
पत्रकारिता एक ऐसा व्यवसाय है, जिसमें ज्ञान के किसी क्षेत्र में विशेषज्ञता अपेक्षित होती है। वह एक कला है, न कि विज्ञान है। उसकी तुलना किसी उद्योग से करने का अर्थ है मन को मशीन के स्तर तक नीचे गिरा देना। जो प्रेस बैरन पत्रकारिता को एक उद्योग मानते हैं, उन्हें इस बात का अहसास है। ऐसा न होता तो वे अच्छे से अच्छे पत्रकारों की तलाश न करते, बल्कि अपनी ही स्थापना में उनका उत्पादन कर लेते। मैं हमारे समाचार-पत्रों में छपने वाली सभी चीजों की हिमायत नहीं कर रहा हूं। उनमें बहुत कुछ कचरा भी होता है। हाल ही में जेनेवा में हुई गैट व्यापार वार्ताओं में मीडिया के मुक्त संकार्य की अमेरिका की मांग को अस्वीकार कर दिया गया। अमेरिका यह चाहता था कि मीडिया को भी बौद्धिक सम्पत्ति में शामिल किया जाए। यूरोपीय शक्तियों ने विशेषत: फ्रांस ने उसे सांस्कृतिक आक्रमण कहकर अस्वीकार कर दिया। वे जीत गए।
हाल ही में एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भारत में विदेशी समाचार-पत्रों के प्रवेश पर चर्चा की, किंतु वे किसी भी निर्णय पर नहीं पहुंचे यह महसूस किया गया कि एक परिपूर्ण चर्चा अपेक्षित होगी। संभवत : शासन को एक प्रेस कमीशन नियुक्त करना चाहिए, जो कि इस विषय पर और समाचार-पत्रों को परेशान करने वाले दूसरे पहलुओं पर विचार करे। एक मीडिया कमीशन की नियुक्ति करना अधिक बेहतर होगा, क्योंकि आक्रमण केवल समाचार-पत्रों को ही नहीं, बल्कि सूचना के अन्य क्षेत्रों को भी प्रभावित कर रहा है। (मीडिया वाद-विवाद, संवाद से साभार)

Thursday, June 24, 2010

शुरू हुई बोलियां, चलने लगी गोलियां




एक बार फिर शांति का अलख जगाने दोनों पड़ोसी मुल्क बातचीत को राजी हो गए। सचिव स्टार की वार्ता के लिए तारीख तय हो गयी। दोनों देशो की तरह से बयानबाजी शुरू हो गयी । मुद्दा भी तय हो गया। बात होगी शांति की ,बात होगी आतंकवाद की , बात होगी सीमा सुरछा । अभी तयारी हो रही थी कि सीमा पर गोलाबारी शुरू हो गयी । इससे पाकिस्तान का इरादा साफ दिखने लगा । इसके बाद भी भारत अपने धैर्य का परिचय दे रहा है । सीमा पर गोली चल रही है । जवान मर रहे हैं । देश के पहरेदार वार्ता कर रहे हैं । एसे नापाक इरादे वाले देश के साथ कि प्रकार से विश्वासकर रहे हैं भारत के मशीहा । इससे लगता है कि भारत फिर कोई बड़ा धोखा खाने वाला है । इस बार पाक की तरफ से भारत के किस हिस्से में बम ब्लास्ट होगा , अब भारतियो को इसका उपहार मिलने वाला है।

Saturday, June 19, 2010

मुस्लिम वोट के चक्कर में कही हिन्दू वोट न घसक जाये

बिहार में उफान, राजनीति में हलचल, गठबंधन में दरार , विपछ को मुद्दा यानि पोस्टर विवाद । किसी नरेन्द्र मोदी के साथ नितीश कुमार का फोटो क्या छाप गया मानो पूरा बिहार नापाक हो गया । आखिर नितीश को मोदी से अलर्जी क्यों है ? बीजेपी नेता होने के कारण , गुजरात का मुख्यमंत्री होने के कारण , बिहार में गठबंधन होने के कारण, गुजरात के विकास के कारण यह सब नहीं है तो गोधरा कांड निश्चित है । गोधरा के कारण मोदी से नितीश को इतना इलर्गी है तो बिहार में सरकार क्यों बनाये । कोसी त्रासदी में मोदी नितीश को पैसा नहीं दिए थे वे उन पीडितो को पैसा दिए थे जो आज भी बेघर है । नितीश कुमार मुसलमानों के वोटबैंक के लिए पैसा लौटाए नितीश के अन्दर इतना स्वाभिमान है तो बीजेपी से गठबंधन क्यों नहीं तोड़ लेते ।यदि मुस्लिम प्रेम है तो हिन्दुओ के साथ हुए अत्याचारों का जबाब क्या है । मुस्लिम वोट के चक्कर में कही हिन्दू वोट न घसक जाये ।

Wednesday, June 16, 2010

कुछ तो करो नहीं तो सब बिक जायेगा

अगले वर्ष के शुरुआत में कुछ राज्यों में आसन्न विधानसभा चुनावों के बीच निर्वाचन आयोग ने बुधवार को चिंता जाहिर करने के साथ ही अधिकारियों को चुनाव संबंधी रिपोर्टो की कड़ी निगरानी करने के निर्देश दिए। निर्वाचन आयोग ने १६ जून २०१० को कहा कि पेड न्यूज की हालिया प्रवृत्ति स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संचालन के संबंध में चिंता पैदा कर रही है जो चिंताजनक अनुपात में है और गंभीर चुनावी अनियमितता है। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को दिए अपने निर्देश में निर्वाचन आयोग ने जिला निर्वाचन अधिकारियों से इस मामले में मीडिया पर कड़ी नजर रखने को भी कहा। आयोग ने कहा कि जिले में प्रसारित और प्रकाशित सभी समाचारपत्रों की कड़ी जांच पड़ताल के लिए जिला निर्वाचन अधिकारी चुनाव की घोषणा होते ही जिला स्तरीय समितियों का गठन कर सकते हैं ताकि न्यूज कवरेज की आड़ में प्रकाशित होने वाले राजनीतिक विज्ञापनों का पता लगाया जा सके। निर्वाचन आयोग के इस पहल का हर कोई सराहना करता है लेकिन यह कितना लागू होगा उस पर सब की निगाहे है । मीडिया मालिको पर जब तक अंकुस नहीं लगेगा तब तक इस तरह का खेल होता रहेगा । निगरानी के बाद दंड की भी ब्यवस्था होनी चाहिए।

Monday, March 15, 2010

बाबा तेरे कितने रूप







गुरु गोबिंद दोउ खड़े काके लागु पाव । बलिहारी गुरु आपने गोबिंद दियो बताय।। यह दोहा तो मै पांचवी में पढ़ा था तब मेरे मन में साधू संतो के प्रति अटूट श्रद्धा थी । मुझे लगता था की यही बाबा है जो भव सागर से पर करते है । इन्हे देश दुनिया से मतलब नहीं होता । धीरे -धीरे उम्र के ३० बसंत गुजर गए । इस३० वर्षो दिल को छूने वाली अनेक घटनाये आई फिर भी बाबाओ पर विश्वास बना रहा । भगवा चोले की आड़ में सैक्स रैकेट चलाने वाले ढोंगी बाबा राजीव रंजन द्विवेदी की करतूतों को लोग भुला भी नहीं पाए थे कि राजधानी के एक मंदिर के पुजारी ने ऐसा कृत्य किया है जिसे सुनकर मानवता का सिर भी शर्म से झुक जाए। साकेत स्थितपुष्प विहार के सेक्टर एक में स्थित शिव मंदिर में पुजारी ने एक मंदबुद्धि युवती से दुष्कर्म किया। विश्वास और देश के लिए धार्मिक कई धार्मिक भगवान पुरुष है या कुछ अन्य में हाल ही में घोटाले उजागर होने के साथ मिलाने लगता है । जो अब इस सूची में और आ गया है जो स्वामी नित्यानंद एक सेक्स घोटाले का आरोप लगाया जा रहा है।
लोकप्रिय तमिल अभिनेत्री के साथ एक समझौता स्थिति में स्वामीजी दिखा फुटेज जारी की हैफुटेज २ मार्च को प्रसारित किया गया। रंजीता के रूप में महिला की पहचान। अब भी क्या बाबाओ पर विश्वास किया जाय। अब तो यही कहा जा सकता है की बाबा तेरे कितने रूप ।

Thursday, February 25, 2010

कर्ज के तले जन्म

एक अरब से अधिक आबादी और 37 प्रतिशत गरीबी के बीच भारत के हर नागरिक पर करीब 8,500 रुपये का विदेशी कर्ज है यानी अगर कोई बच्चा जन्म लेता है तो वह भी करीब इतने ही आर्थिक बोझ से दबा होगा। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा गुरूवार को लोकसभा में पेश आर्थिक समीक्षा में कहा गया कि भारत का विदेशी ऋण मार्च, 2009 के अंत में 224.59 अरब अमेरिकी डालर था, जो मार्च, 2008 के 224.41 अरब डालर के स्तर से कहीं अधिक है।इस आंकड़े की अगर एक एक व्यक्ति के आधार पर गणना की जाए तो हर नागरिक पर करीब 8,500 रुपये से अधिक का विदेशी कर्ज बैठता है। समीक्षा में कहा गया कि 2009-10 की पहली छमाही के दौरान कुल विदेशी ऋण 18.2 अरब अमेरिकी डालर बढ़कर 242.8 अरब अमेरिकी डालर हो गया। इसमें कहा गया कि दीर्घकालिक ऋण 19.2 अरब अमेरिकी डालर बढ़कर 200.4 अरब अमेरिकी डालर हो गया जबकि अल्पावधिक ऋण 98.50 करोड़ अमेरिकी डालर घटकर 42.2 अरब डालर हो गया। समीक्षा में कहा गया कि दीर्घावधि का ऋण का हिस्सा सितंबर, 2009 के अंत में 82.5 प्रतिशत रहा जो मार्च, 2009 के अंत में 80.7 प्रतिशत था।

Monday, December 21, 2009

बड़ी कठिन है डगर

उत्तर प्रदेश में भाजपा के नए अध्यक्ष की तलाश शुरू हो गई है। राज्य में सबसे खराब दौर से गुजर रही भाजपा को वहां पर ऐसे नेतृत्व की दरकार है जो उसकी खोई हुई जमीन व साख वापस ला सके। इस पद के लिए फिलहाल जिन नामों की चर्चा है, उनमें पूर्व मंत्री सूर्य प्रताप शाही व लखनऊ के मेयर रह चुके दिनेश चंद्र शर्मा प्रमुख हैं। नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उत्तर प्रदेश को रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण करार देते हुए कहा है कि सबसे ज्यादा ताकत देने वाला यह प्रदेश उनके लिए अहम है। लोकसभा में उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा सांसद आते हैं। केंद्र में किसी पार्टी की सरकार बनने-बिगड़ने का खेल काफी हद तक इस राज्य में उस पार्टी की हैसियत पर निर्भर करता है। यहां भाजपा का हाल सबसे बुरा है। उत्तर प्रदेश के राजनाथ सिंह के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए भी हालात ठीक नहीं हो सके। अब गडकरी की सफलता भी उत्तर प्रदेश में उनकी सफलता से जुड़ गई है। गडकरी को सबसे पहले उत्तर प्रदेश के नए नेतृत्व के बारे में फैसला लेना है। मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी के कार्यकाल में पार्टी को चुनावी सफलता तो नहीं ही मिली, वह पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को साथ लेकर चलने में भी नाकामयाब रहे। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष के भी उत्तर प्रदेश से होने के चलते त्रिपाठी की असफलताओं की तरफ किसी का खास ध्यान नहीं गया। सूत्रों के अनुसार प्रदेश की नई टीम अगले माह तक तैयार हो जाएगी। प्रदेश अध्यक्ष के लिए फिलहाल शाही व शर्मा के नाम सबसे आगे हैं। शाही प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुके हैं और पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रभावी नेता माने जाते हैं। जबकि दिनेश शर्मा लखनऊ के मेयर रह चुके हैं। संघ की ओर से पार्टी नेतृत्व के लिए खींची गई आयु रेखा के हिसाब से शाही कमतर बैठते हैं। वह साठ से ऊपर के हैं, जबकि शर्मा इससे कम के हैं। तमाम पहलुओं पर चर्चा कर गडकरी को जल्द ही अंतिम निर्णय लेना होगा।

Saturday, December 19, 2009

डूबती नैया के खेवैया


भाजपा का कमान संघ के निर्देशानुसार एक युवा के हाथों में सौप दिया गया वह भी उस समय जब भाजपा में अंतर्कलह चरम पर है । जब पार्टी में केंद्रीय स्तर से लेकर राज्य स्तर तक केवल बयानबाजी का बोलबाला है । सभी एक दुसरे पर छितकसी कर रहे है । ऐसे समय पर संजीवनी के स्थान पर एक और समस्या खड़ा हो गया ।कांग्रेस के राहुल में मुकाबला करने के लिए यह मराठी मानुस कितना कारगर साबित होगा । क्या हिंदी भाषी प्रदेशों में भाजपा की खोई जनाधार वापस आ पायेगी या वही आया राम गया राम साबित होगा । क्या भाजपा के धुरंधर इन्हें पचा पायेगे । क्या संघ का यह प्रयोग भाजपा को उचाई पर ले जाने में सफल होगा। आज नितिन गडकरी के विचारो से आडवानी जिस प्रकार दुखी हुए इससे तो लगता है की सायद आडवानी जी यही सोच रहे होगे को क्या इसी दिन के लिए भाजपा को सीचा था । इससे तो लगता है की भाजपा में अटल के बाद आडवानी युग कभी अंत हो गया ।

Monday, December 14, 2009

बंटवारे की राजनीति

एक बार 1947 में देश बटा जिसका खामियाजा भारत आज तक भुगत रहा है । यदि भारत -पाक के विभाजन न हुआ होता तो आज न कश्मीर मुद्दा होता न आतंकवाद पनपता। नेहरू और जिन्ना के विचारों पर महात्मा गाँधी कि मुहर लगना भारत के लिए नासूर बन गया है । देश के विभाजन के समय सरदार पटेल कितना पापड़ बेलकर देसी रियासतों को भारत में विलय कराए थे क्या इसी दिन के लिए कि इस भारत का तार-तार हो जाए। आज जिस तरह से छोटे राज्यों कि मांग चल रही है उससे तो लगता है कि एक दिन येसा भी आयेगा जब देस का हर जिला प्रदेश बन जाएगा, हर सांसद मुख्यमंत्री बन जाएगा । फिर संसद में केवल बुद्धिजीवी बैठकर तमासा देखेंगे । हर राज्य स्वतंत्रता कि मांग करेगा । तब भारत में कितने पाकिस्तान बनेगे इसका कल्पना नही किया जा सकता । वैसे ही भारत धर्म, जाति,भाषा,संप्रदाय ,गोरे काले अगड़े पिछड़े ,आतंकवाद, नक्सलवाद, छेत्रवाद का दंश झेल रहा है । अब आगे क्या होगा इसकी कल्पना नही कि जा सकती ।

Monday, November 16, 2009

अखंडता का खंड करने की साजिश

भारतीय संविधान में एकता और अखंडता का उल्लेख प्रस्तावना में दर्ज है। भारत का कोई भी नागरिक देश में कही भी निर्वाध रूप से रह सकता है और जीविकोपार्जन कर सकता है । लेकिन आज जो देश के अन्दर हिन्दी भाषियों के साथ हो रहा है । महाराष्ट्र विधान सभा के अन्दर मनसे द्वारा कृत्य किया गया उसे देखकर ऐशा लगा की जब भारत में भारतीय सुरछित नही है तो आस्ट्रेलिया में कैसे रह सकते है । जब आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रो पर हमला हुआ तो पूरा देश चिल्लाया लेकिन जब यही घटना महाराष्ट्र में हुआ तो देसवाशी मौन क्यो हो गए । क्या राज ठाकरे संविधान से ऊपर हो गये है या बाबा भीमराव आंबेडकर के संबिधान को भूल गये।