Thursday, December 23, 2010

विकीलीक्स’ ने खोजी पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया है


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‘विकीलीक्स’ वेबसाइट आज किसी परिचय की मोहताज नहीं रही। इसने एक ऐसी वेबसाइट के रूप में ख्याति पाई है जिसने न सिर्फ दुनिया की दशा और दिशा तय करने वाले देश की राजनीतिक जड़ों को हिला कर रख दिया है बल्कि डिजिटल मीडिया के नए ताकतवर अवतार को भी दुनिया के सामने रखा है। यह परंपरागत मीडिया से कहीं ज्यादा प्रभावशाली और कम समय में पाठकों तक समाचार पहुंचाने का माध्यम बनकर भी उभरा है।
लेकिन इसने कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। मीडिया के क्षेत्र में यह नयी ताकत के रुप में उभरा है साथ में नया खतरा भी। क्या यह डिजिटल मीडिया के लिए एक नया अवसर नहीं है? यह सवाल भी खड़ा होता है कि जब इस तरह के दस्तावेज मीडिया के सामने हों तो पहले देशहित है या जनहित। सबसे अहम सवाल यह है कि ‘विकीलीक्स’ की तरह कोई वेबसाइट अगर भारत में काम करने लगे तो उसका अंजाम क्या होगा?
वेबसाइट पर खुलासे पहले भी हो चुके हैं
साइबर पत्रकार, पीयूष पाण्डे के अनुसार, “डिजीटल मीडिया में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब किसी साइट ने बड़े खुलासे किए हों। propublic.org (प्रोपब्लिकाडॉटओआरजी) को तो पुलित्जर अवॉर्ड भी मिल चुका है। ‘तहलका’ भी मैच फिक्सिंग और रक्षा सौदों में दलाली का सनसनीखेज खुलासा कर चुकी है। लेकिन, ‘विकीलीक्स’ ने खोजी पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया है। ‘विकीलीक्स’ ने खोजी पत्रकारिता को तथ्यों के साथ परोसा और दुनिया के कई मुल्कों की राजसत्ता से जुड़े गड़बडझालों को सामने रखा।”
प्रवीण साहनी के अनुसार, “बदलते दौर में, समय की कमी और नेट फ्रेंडली समाज के लिए डिजिटल मीडिया एक अवसर लेकर आया है। यहां हम यह भी बताते चलें कि nnilive.com (एनएनआई लाइव डॉट कॉम) का कॉन्सेप्ट भी इसी पर आधारित है। हमने भी, ललित मोदी पर ड्रग्स रखने संबंधी एफआईआर की कॉपी के अलावा कुछ अन्य दस्तावेज उसी रूप में प्रकाशित किया था।”
‘वेबदुनिया’ कंटेंट हेड, जयदीप कर्णिका ने कहा, “विकीलिक्स ने जो तहलका मचाया है वो उन सूचनाओं के आधार पर मचाया है जो बहुत गोपनीय थीं और सार्वजनिक रूप से उजागर कर दी गईं। ये अलग तरह की पत्रकारिता जरूर है लेकिन मैं इसे अलग तरह का मीडिया नहीं मानूंगा। वो इसलिए की मीडिया में आज भी संपादक नाम की संस्था अस्तित्व में है।”
भारतीय डिजिटल मीडिया पर इसका प्रभाव
‘समयलाइव.कॉम’ के हेड, पाणिनी आनंद ने कहा कि “भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि यहां पर ऐसी वेबसाइट नहीं आ सकती है। लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी एडिटोरियल कॉल को लेने वालों की होती है जो विश्वनीयता,पारदर्शिता और निष्पक्षता-पूर्व ऐसे दस्तावेजों को पाठकों के सामने लाये। ‘विकीलीक्स’ से ख़बरें निकल रही है वो दुनिया के शक्तिशाली राज्यों के बारे में बात कर रही हैं। ‘विकीलिक्स’ की बटुली से अभी कुछ ही चावल निकले हैं अभी पूरा भात निकलना बाकी है, न जाने उन चावलों पर अभी किन-किन देशों का नाम लिखा हुआ है।”
साइबर पत्रकार, पीयूण पाण्डे के अनुसार, “डिजीटल मीडिया खुद अपनी जगह बना रहा है और जल्द ही इसकी गुणवत्ता और ब्रांडिंग इस तरह की होगी कि सभी लोग इससे जुड़ना चाहेंगे। ‘विकीलीक्स’ जैसी साइट कहीं भी आए, उसे विरोध झेलना ही पड़ेगा क्योंकि राजसत्ता कहीं की भी हो, वो अपने खिलाफ लगातार वार सहन नहीं कर पाती।”
‘वेबदुनिया’ कंटेंट हेड, जयदीप कर्णिका ने कहा, “डिजिटल मीडिया की सबसे बड़ी दिक्कत है, विश्वसनीयता की। जानकारी की अधिकता है और ऐसे में सही जानकारी तक पहुंचना कठिन है। दूसरा है पहुंच। राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों से संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक करना गलत है, लेकिन जूलियन असांज ने जो किया वो इस सबसे कहीं आगे है.... वो राष्ट्र की सीमाओं से परे जाकर उठाया गया कदम है और इसके वास्तविक प्रभावों तक पहुंच पाने में अभी समय लगेगा...।”
समाचार4मीडिया।कॉम से साभार

Saturday, October 23, 2010

विदेशी समाचार-पत्रों का प्रवेश


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कुलदीप नैयर, वरिष्ठ पत्रकार
भारत में विदेशी समाचार-पत्रों का प्रवेश एक ही ऐसा विषय है, जिसने एक ऐसी ही अनुक्रिया को जन्म दिया है। वह या तो बहुत भावात्मक है या फिर बहुत कारोबारी है। यह वाद-विवाद इस अर्थ में अवास्तविक है कि मध्यम और छोटे समाचार-पत्र,जो कि हमारे देश अधिसंख्यक है, इस वाद-विवाद में कही भी दिखाई नहीं देते। वस्तुत: ऐसा प्रतीत होता है कि लड़ाई बड़े समाचार-पत्रों के एक समुच्चय और दूसरे समुच्चय के बीच की है। यह वाद-विवाद तब पैदा हुआ, जब एक समाचार-पत्र के साथ भारत से उसका एक सहकालिक संस्करण आरंम्भ करने का अनुबंध किया । कुछ अन्य लोगों ने उसका अनुकरण किया और समाचार-पत्रों के कुछ अन्य विदेशी समूहों के साथ अनुबंध किया, जबकि इस बिषय पर केद्रिय शासन का अनुमोदन प्रतीक्षित था (वह अस्वीकार कर दिया गया है) एक समाचार पत्र उच्च न्यायालय जा पहुंचा और उसने इस तर्क पर स्थगन आदेश अभिप्राय कर लिया कि यदि किसी विदेशी समाचार पत्र को उसी नाम से, जो कि उसने भारतीय समाचार पत्रों के रजिस्ट्रार से अभिप्राप्त किया है, हमारे देश में समाचार पत्र प्रकाशित प्रकाशित करने की अनुमति दी जाती है तो इससे उसके द्धारा अभिप्राप्त नाम का अतिक्रमण होगा। यदि यह वाद-विवाद शीर्षक या नाम तक ही सीमित होता ते उसका समाधान किया जा सकता था। आखिरकार अनेक समाचार-पत्र विशिष्ट नाम हथिया लेते हैं और वे समाचार-पत्र प्रकाशित नहीं होते। यदि वे प्रकाशित होते भी हैं तो वे नियमित नहीं होते। ऐसा प्रतीत होता है कि आरंभ से ही विवाद का विषय यह था कि विदेशी समाचार-पत्रों को भारत में प्रवेश करने दिया जाना चाहिए या नहीं।
समर्थकों ने भी और विरोधियों ने भी बहुत से मुद्दें उठाए हैं, किंतु प्रमुख मुद्दें दो ही हैं। समर्थकों द्वारा उठाया गया एक मुद्दा यह है कि क्या भारतीय समाचार पत्र प्रतियोगित से डरते हैं, जो कि किसी भी आर्थिक सुधार के लिए बुनियादी चीज होती है। यह एक वजनदार तर्क है, किंतु उसमें विश्वसनीयता का अभाव है, क्योंकि भारत में लगभग 12000 दैनिक समाचार-पत्र और विभिन्न विचारधाराओं और उद्देश्यों वाली अनेक अन्य पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है, जो कि एक-दूसरे के साथ प्रतियोगिता कर रहे हैं। वस्तुत: हर इंच क्षेत्र के लिए लड़ते हैं और प्रसार में अपने प्रतिस्पर्धी को दबाने के लिए सभी प्रकार के तौर-तरीके अपनाते हैं, जिसमें अनैतिक तौर-तरीके भी शामिल होते हैं।
वास्तविक मुद्दा यह है कि हम इस बात पर विचार करें कि विदेशी समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं से हमें कौन-सी क्षति हो सकती है। वे हमारे देश में पहले से ही उपलब्ध हैं, हालांकि उनका मूल्य अत्यधिक है। अपने विशाल संसाधन के बल पर वे एक अस्वस्थ प्रतियोगिता को जन्म दे सकते हैं। वे वर्तमान मूल्य को कम कर सकता है। भारी-भरकम आकार दे सकते हैं, जो कि एक समाचार-पत्र के रूप में भी खरीददार के लिए एक आकर्षक प्रस्ताव होगा।
यह हो सकता है कि विदेशी समाचार-पत्र, जो आधुनिकतम प्रौधोगिकी प्रदान कर सकते हैं, उससे भारतीय समाचार-पत्रों के पलायन से पड़ेगा, क्योंकि विदेशी समाचार-पत्रों से मिलने वाली मोटी तनख्वाहों और परिलब्धियों के आकर्षण से वे अपरहार्यत: विदेशी समाचार-पत्रों की ओर आकर्षित होंगे। यह पलायन हमारे देश के भीतर होने वाला प्रतिभा पलायन होगा।
यह सब उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितनी कि महत्वपूर्ण वह तबाही है, जो कि उनके हाथों हमारी घरेलू राजनीति की होगी। कुछ लोग अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करेंगे। उनकी अभिवृत्तियां देश के लिए बिरले ही अनुकूल रही हैं। तृतीय विश्व पर दिए जाने वाले सीधे-सीधे संवाद में भी वे कोई दृष्टिकोण बेचना चाहते हैं। भारत में किसी समाचार-पत्र या पत्रिका का लोगों पर, लोगों के विचारों पर और लोगों के व्यवहारों पर बहुत प्रभाव होते है, वे लोगों का मार्गदर्शन करते हैं। रेडियो और टीवी के कार्यक्रमों का प्रभाव अस्थायी होता है, जबकि समाचार-पत्रों में छपने वाली सामग्री का प्रभाव स्थायी होता है। उसे विशेषत: ग्रामीण क्षेत्रों में जहां कि अस्सी प्रतिशत लोग रहते हैं, धर्म ग्रंथों में लिखित सत्य वचन के रूप में माना जाता है। क्या विदेशियों को, जो कि भारत के लोकाचार से अनभिज्ञ हैं और हमारे राष्ट्रीय हितों के प्रति शत्रुतापूर्ण भी हो सकते हैं। ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति दी जानी चाहिए, जहां के लोगों को बाहरी प्रभाव सारभूत रूप से प्रभावित करते हैं। वे कतिपय ऐसे विवादों को पुनरुज्जीवितकर सकते हैं, जो कि आज शांत हैं। उनके लेखन संदिग्ध होंगे हमारे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप माना जा सकता है। भारत लोगों को ही यह निर्णय करना चाहिए कि किस प्रकार के भारत का निर्माण किया जाना जाना है। हम गलतियां करेंगे, किंतु वे गलतियां हमारी अपनी होंगी।
अन्यथा कहीं तो रेखा खींचनी ही होगी। यह बात भले ही अटपटी लग सकती है, किंतु जनमत को आकार देने का उत्तरदायित्व उन लोगों को ही सौंपा जाना चाहिए, जो लोग देश के कार्यों में आंतरिक रूप से अंतर्ग्रस्त हैं, न कि मात्र वित्तीय रूप में। वस्तुत : यह मांग कभी भी नहीं रही हैं कि विदेशियों को भारत में राजनीतिक दल आरम्भ करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
विदेशी समाचार अभिकरण भी निर्दोष नहीं है। जनता सरकार के शासनकाल में समाचार अभिकरणों के पुनर्गठन के लिए गठित समीति ने यह कहा खा कि विदेशी समाचार अभिकरणों के समाचार प्रोपेगंडा से परिपूर्ण होते हैं। उनकी समाचार सामग्री से धारणा बनती है मानो कि वे अपने विदेश कार्यालय के विस्तार हों। यह समीति इस निष्कर्ष पर पहुंची कि विदेशों के समाचार देने के लिए भारत के पास उसका पना समाचार अभिकरण होना चाहिए, ताकि पाठकों को अधिक वस्तुनिष्ठ समाचार उपलब्ध हो सकें। पिछले पंद्रह सालों से यह प्रस्ताव लटका हुआ है।
विदेशी समाचार पत्रों को भारत में प्रवेश देने में एक और भी अड़चन है।
संविधान के अनुच्छेद-19 में यह कहा गया है कि सभी नागरिक को वाणी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। अनुच्छेद-5 में दी गई परिभाषा के अनुसार नागरिक का अर्थ है वह भारतीय, जो कि जन्म, अधिवास आदि से नागरिक हो। जैसा कि उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय में कहा गया है, किसी स्वतंत्र देश के नागरिक की परिस्थिति में अंतर्निहित प्राकृतिक अधिकारों का प्रयोग विदेशियों द्वारा नहीं किया जा सकता है।
कुछ लोग अनुच्छेद-19 को विश्वव्यापीकरण के विपरीत मान सकते हैं, किंतु यह बात तृतीय विश्वस के देशों में जीतनी सच हैं, उतनी ही सच विकसित देशों में भी है। मीडिया मुगल रूपर्ट मडार्ख को भी अमेरिका में एक टीवी नेटवर्क का स्वामी बनाने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका को राष्ट्रिक बनना पड़ा। सॉनी कंपनी को, जिसने सी.बी.एस में सारभूत संख्या में शेयर अर्जित कर लिए, अमरीकियों को यह आश्वासन देकर शांत करना पड़ा कि वह अमरीकी लोगों पर जापानी संस्कृति नहीं थोपेगी। यह तर्क उचित नहीं है कि समाचार-पत्र व्यवसाय एक उद्योग है। समाचार-पत्र इस्पात, कपड़े या पटसन जैसा कोई उत्पाद नहीं हैं। वह समाचारों और दृष्टिकोणों प्रत्ययों और विचारों का सहवर्तन है। वह कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं है, जिसमें एक सिरे पर कच्चा माल भर देने पर दूसरे सिरे से कोई तैयार माल निकल आए। लेखन, सृजनशीलता है, न कि स्वचालित क्रिया है।
पत्रकारिता एक ऐसा व्यवसाय है, जिसमें ज्ञान के किसी क्षेत्र में विशेषज्ञता अपेक्षित होती है। वह एक कला है, न कि विज्ञान है। उसकी तुलना किसी उद्योग से करने का अर्थ है मन को मशीन के स्तर तक नीचे गिरा देना। जो प्रेस बैरन पत्रकारिता को एक उद्योग मानते हैं, उन्हें इस बात का अहसास है। ऐसा न होता तो वे अच्छे से अच्छे पत्रकारों की तलाश न करते, बल्कि अपनी ही स्थापना में उनका उत्पादन कर लेते। मैं हमारे समाचार-पत्रों में छपने वाली सभी चीजों की हिमायत नहीं कर रहा हूं। उनमें बहुत कुछ कचरा भी होता है। हाल ही में जेनेवा में हुई गैट व्यापार वार्ताओं में मीडिया के मुक्त संकार्य की अमेरिका की मांग को अस्वीकार कर दिया गया। अमेरिका यह चाहता था कि मीडिया को भी बौद्धिक सम्पत्ति में शामिल किया जाए। यूरोपीय शक्तियों ने विशेषत: फ्रांस ने उसे सांस्कृतिक आक्रमण कहकर अस्वीकार कर दिया। वे जीत गए।
हाल ही में एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भारत में विदेशी समाचार-पत्रों के प्रवेश पर चर्चा की, किंतु वे किसी भी निर्णय पर नहीं पहुंचे यह महसूस किया गया कि एक परिपूर्ण चर्चा अपेक्षित होगी। संभवत : शासन को एक प्रेस कमीशन नियुक्त करना चाहिए, जो कि इस विषय पर और समाचार-पत्रों को परेशान करने वाले दूसरे पहलुओं पर विचार करे। एक मीडिया कमीशन की नियुक्ति करना अधिक बेहतर होगा, क्योंकि आक्रमण केवल समाचार-पत्रों को ही नहीं, बल्कि सूचना के अन्य क्षेत्रों को भी प्रभावित कर रहा है। (मीडिया वाद-विवाद, संवाद से साभार)

Thursday, June 24, 2010

शुरू हुई बोलियां, चलने लगी गोलियां




एक बार फिर शांति का अलख जगाने दोनों पड़ोसी मुल्क बातचीत को राजी हो गए। सचिव स्टार की वार्ता के लिए तारीख तय हो गयी। दोनों देशो की तरह से बयानबाजी शुरू हो गयी । मुद्दा भी तय हो गया। बात होगी शांति की ,बात होगी आतंकवाद की , बात होगी सीमा सुरछा । अभी तयारी हो रही थी कि सीमा पर गोलाबारी शुरू हो गयी । इससे पाकिस्तान का इरादा साफ दिखने लगा । इसके बाद भी भारत अपने धैर्य का परिचय दे रहा है । सीमा पर गोली चल रही है । जवान मर रहे हैं । देश के पहरेदार वार्ता कर रहे हैं । एसे नापाक इरादे वाले देश के साथ कि प्रकार से विश्वासकर रहे हैं भारत के मशीहा । इससे लगता है कि भारत फिर कोई बड़ा धोखा खाने वाला है । इस बार पाक की तरफ से भारत के किस हिस्से में बम ब्लास्ट होगा , अब भारतियो को इसका उपहार मिलने वाला है।

Saturday, June 19, 2010

मुस्लिम वोट के चक्कर में कही हिन्दू वोट न घसक जाये

बिहार में उफान, राजनीति में हलचल, गठबंधन में दरार , विपछ को मुद्दा यानि पोस्टर विवाद । किसी नरेन्द्र मोदी के साथ नितीश कुमार का फोटो क्या छाप गया मानो पूरा बिहार नापाक हो गया । आखिर नितीश को मोदी से अलर्जी क्यों है ? बीजेपी नेता होने के कारण , गुजरात का मुख्यमंत्री होने के कारण , बिहार में गठबंधन होने के कारण, गुजरात के विकास के कारण यह सब नहीं है तो गोधरा कांड निश्चित है । गोधरा के कारण मोदी से नितीश को इतना इलर्गी है तो बिहार में सरकार क्यों बनाये । कोसी त्रासदी में मोदी नितीश को पैसा नहीं दिए थे वे उन पीडितो को पैसा दिए थे जो आज भी बेघर है । नितीश कुमार मुसलमानों के वोटबैंक के लिए पैसा लौटाए नितीश के अन्दर इतना स्वाभिमान है तो बीजेपी से गठबंधन क्यों नहीं तोड़ लेते ।यदि मुस्लिम प्रेम है तो हिन्दुओ के साथ हुए अत्याचारों का जबाब क्या है । मुस्लिम वोट के चक्कर में कही हिन्दू वोट न घसक जाये ।

Wednesday, June 16, 2010

कुछ तो करो नहीं तो सब बिक जायेगा

अगले वर्ष के शुरुआत में कुछ राज्यों में आसन्न विधानसभा चुनावों के बीच निर्वाचन आयोग ने बुधवार को चिंता जाहिर करने के साथ ही अधिकारियों को चुनाव संबंधी रिपोर्टो की कड़ी निगरानी करने के निर्देश दिए। निर्वाचन आयोग ने १६ जून २०१० को कहा कि पेड न्यूज की हालिया प्रवृत्ति स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संचालन के संबंध में चिंता पैदा कर रही है जो चिंताजनक अनुपात में है और गंभीर चुनावी अनियमितता है। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को दिए अपने निर्देश में निर्वाचन आयोग ने जिला निर्वाचन अधिकारियों से इस मामले में मीडिया पर कड़ी नजर रखने को भी कहा। आयोग ने कहा कि जिले में प्रसारित और प्रकाशित सभी समाचारपत्रों की कड़ी जांच पड़ताल के लिए जिला निर्वाचन अधिकारी चुनाव की घोषणा होते ही जिला स्तरीय समितियों का गठन कर सकते हैं ताकि न्यूज कवरेज की आड़ में प्रकाशित होने वाले राजनीतिक विज्ञापनों का पता लगाया जा सके। निर्वाचन आयोग के इस पहल का हर कोई सराहना करता है लेकिन यह कितना लागू होगा उस पर सब की निगाहे है । मीडिया मालिको पर जब तक अंकुस नहीं लगेगा तब तक इस तरह का खेल होता रहेगा । निगरानी के बाद दंड की भी ब्यवस्था होनी चाहिए।

Monday, March 15, 2010

बाबा तेरे कितने रूप







गुरु गोबिंद दोउ खड़े काके लागु पाव । बलिहारी गुरु आपने गोबिंद दियो बताय।। यह दोहा तो मै पांचवी में पढ़ा था तब मेरे मन में साधू संतो के प्रति अटूट श्रद्धा थी । मुझे लगता था की यही बाबा है जो भव सागर से पर करते है । इन्हे देश दुनिया से मतलब नहीं होता । धीरे -धीरे उम्र के ३० बसंत गुजर गए । इस३० वर्षो दिल को छूने वाली अनेक घटनाये आई फिर भी बाबाओ पर विश्वास बना रहा । भगवा चोले की आड़ में सैक्स रैकेट चलाने वाले ढोंगी बाबा राजीव रंजन द्विवेदी की करतूतों को लोग भुला भी नहीं पाए थे कि राजधानी के एक मंदिर के पुजारी ने ऐसा कृत्य किया है जिसे सुनकर मानवता का सिर भी शर्म से झुक जाए। साकेत स्थितपुष्प विहार के सेक्टर एक में स्थित शिव मंदिर में पुजारी ने एक मंदबुद्धि युवती से दुष्कर्म किया। विश्वास और देश के लिए धार्मिक कई धार्मिक भगवान पुरुष है या कुछ अन्य में हाल ही में घोटाले उजागर होने के साथ मिलाने लगता है । जो अब इस सूची में और आ गया है जो स्वामी नित्यानंद एक सेक्स घोटाले का आरोप लगाया जा रहा है।
लोकप्रिय तमिल अभिनेत्री के साथ एक समझौता स्थिति में स्वामीजी दिखा फुटेज जारी की हैफुटेज २ मार्च को प्रसारित किया गया। रंजीता के रूप में महिला की पहचान। अब भी क्या बाबाओ पर विश्वास किया जाय। अब तो यही कहा जा सकता है की बाबा तेरे कितने रूप ।

Thursday, February 25, 2010

कर्ज के तले जन्म

एक अरब से अधिक आबादी और 37 प्रतिशत गरीबी के बीच भारत के हर नागरिक पर करीब 8,500 रुपये का विदेशी कर्ज है यानी अगर कोई बच्चा जन्म लेता है तो वह भी करीब इतने ही आर्थिक बोझ से दबा होगा। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा गुरूवार को लोकसभा में पेश आर्थिक समीक्षा में कहा गया कि भारत का विदेशी ऋण मार्च, 2009 के अंत में 224.59 अरब अमेरिकी डालर था, जो मार्च, 2008 के 224.41 अरब डालर के स्तर से कहीं अधिक है।इस आंकड़े की अगर एक एक व्यक्ति के आधार पर गणना की जाए तो हर नागरिक पर करीब 8,500 रुपये से अधिक का विदेशी कर्ज बैठता है। समीक्षा में कहा गया कि 2009-10 की पहली छमाही के दौरान कुल विदेशी ऋण 18.2 अरब अमेरिकी डालर बढ़कर 242.8 अरब अमेरिकी डालर हो गया। इसमें कहा गया कि दीर्घकालिक ऋण 19.2 अरब अमेरिकी डालर बढ़कर 200.4 अरब अमेरिकी डालर हो गया जबकि अल्पावधिक ऋण 98.50 करोड़ अमेरिकी डालर घटकर 42.2 अरब डालर हो गया। समीक्षा में कहा गया कि दीर्घावधि का ऋण का हिस्सा सितंबर, 2009 के अंत में 82.5 प्रतिशत रहा जो मार्च, 2009 के अंत में 80.7 प्रतिशत था।