बिहार चुनाव इस बार कुछ अलग अंदाज में दिख रहा है। रोज नए-नए शब्दों का उदय हो रहा है। नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, नरेंद्र मोदी, अमित शाह ने जिस प्रकार से शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं उससे लगता है कि यदि कोई भाषा वैज्ञानिक इस पर गौर करे तो उसे एक चुनावी डिक्शनरी तैयार करने में मदद मिलेगी। इतना ही नहीं उसे मेहनत की जरुरत भी नहीं पड़ेगी। न ही किसी को साभार कहना पड़ेगा बल्कि कोई पब्लिकेशन वाला हाथ जोड़कर छापने के लिए तैयार हो जाएगा। वह डिक्शनरी हाथोहाथ बिक भी जाएगी। उस डिक्शनरी की डिमांड राजनेता से लेकर फिल्मी दुनिया के लोगों को अधिक रहेगी। अाप चाहे तो इन शब्दों का पेटेंट करा लो तो कोई यह नहीं कह पाएगा की ये चोरी का शब्द है। लालू के हर शब्दों पर फिल्म बन जाएगी। मोदी के हर वाक्य हर राजनीतियों के जुबान पर होगी। नीतीश का हर जुमला बचाव पक्ष का हथियार बन जाएगा। यदि अाप लोगों को लग रहा है कि व्यंग छूट रहा है तो राजनीति के कुवांरे भाई राहुल के शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं।
Wednesday, October 7, 2015
Subscribe to:
Comments (Atom)

