कुलदीप नैयर, वरिष्ठ पत्रकार
भारत में विदेशी समाचार-पत्रों का प्रवेश एक ही ऐसा विषय है, जिसने एक ऐसी ही अनुक्रिया को जन्म दिया है। वह या तो बहुत भावात्मक है या फिर बहुत कारोबारी है। यह वाद-विवाद इस अर्थ में अवास्तविक है कि मध्यम और छोटे समाचार-पत्र,जो कि हमारे देश अधिसंख्यक है, इस वाद-विवाद में कही भी दिखाई नहीं देते। वस्तुत: ऐसा प्रतीत होता है कि लड़ाई बड़े समाचार-पत्रों के एक समुच्चय और दूसरे समुच्चय के बीच की है। यह वाद-विवाद तब पैदा हुआ, जब एक समाचार-पत्र के साथ भारत से उसका एक सहकालिक संस्करण आरंम्भ करने का अनुबंध किया । कुछ अन्य लोगों ने उसका अनुकरण किया और समाचार-पत्रों के कुछ अन्य विदेशी समूहों के साथ अनुबंध किया, जबकि इस बिषय पर केद्रिय शासन का अनुमोदन प्रतीक्षित था (वह अस्वीकार कर दिया गया है) एक समाचार पत्र उच्च न्यायालय जा पहुंचा और उसने इस तर्क पर स्थगन आदेश अभिप्राय कर लिया कि यदि किसी विदेशी समाचार पत्र को उसी नाम से, जो कि उसने भारतीय समाचार पत्रों के रजिस्ट्रार से अभिप्राप्त किया है, हमारे देश में समाचार पत्र प्रकाशित प्रकाशित करने की अनुमति दी जाती है तो इससे उसके द्धारा अभिप्राप्त नाम का अतिक्रमण होगा। यदि यह वाद-विवाद शीर्षक या नाम तक ही सीमित होता ते उसका समाधान किया जा सकता था। आखिरकार अनेक समाचार-पत्र विशिष्ट नाम हथिया लेते हैं और वे समाचार-पत्र प्रकाशित नहीं होते। यदि वे प्रकाशित होते भी हैं तो वे नियमित नहीं होते। ऐसा प्रतीत होता है कि आरंभ से ही विवाद का विषय यह था कि विदेशी समाचार-पत्रों को भारत में प्रवेश करने दिया जाना चाहिए या नहीं।
समर्थकों ने भी और विरोधियों ने भी बहुत से मुद्दें उठाए हैं, किंतु प्रमुख मुद्दें दो ही हैं। समर्थकों द्वारा उठाया गया एक मुद्दा यह है कि क्या भारतीय समाचार पत्र प्रतियोगित से डरते हैं, जो कि किसी भी आर्थिक सुधार के लिए बुनियादी चीज होती है। यह एक वजनदार तर्क है, किंतु उसमें विश्वसनीयता का अभाव है, क्योंकि भारत में लगभग 12000 दैनिक समाचार-पत्र और विभिन्न विचारधाराओं और उद्देश्यों वाली अनेक अन्य पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है, जो कि एक-दूसरे के साथ प्रतियोगिता कर रहे हैं। वस्तुत: हर इंच क्षेत्र के लिए लड़ते हैं और प्रसार में अपने प्रतिस्पर्धी को दबाने के लिए सभी प्रकार के तौर-तरीके अपनाते हैं, जिसमें अनैतिक तौर-तरीके भी शामिल होते हैं।
वास्तविक मुद्दा यह है कि हम इस बात पर विचार करें कि विदेशी समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं से हमें कौन-सी क्षति हो सकती है। वे हमारे देश में पहले से ही उपलब्ध हैं, हालांकि उनका मूल्य अत्यधिक है। अपने विशाल संसाधन के बल पर वे एक अस्वस्थ प्रतियोगिता को जन्म दे सकते हैं। वे वर्तमान मूल्य को कम कर सकता है। भारी-भरकम आकार दे सकते हैं, जो कि एक समाचार-पत्र के रूप में भी खरीददार के लिए एक आकर्षक प्रस्ताव होगा।
यह हो सकता है कि विदेशी समाचार-पत्र, जो आधुनिकतम प्रौधोगिकी प्रदान कर सकते हैं, उससे भारतीय समाचार-पत्रों के पलायन से पड़ेगा, क्योंकि विदेशी समाचार-पत्रों से मिलने वाली मोटी तनख्वाहों और परिलब्धियों के आकर्षण से वे अपरहार्यत: विदेशी समाचार-पत्रों की ओर आकर्षित होंगे। यह पलायन हमारे देश के भीतर होने वाला प्रतिभा पलायन होगा।
यह सब उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितनी कि महत्वपूर्ण वह तबाही है, जो कि उनके हाथों हमारी घरेलू राजनीति की होगी। कुछ लोग अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करेंगे। उनकी अभिवृत्तियां देश के लिए बिरले ही अनुकूल रही हैं। तृतीय विश्व पर दिए जाने वाले सीधे-सीधे संवाद में भी वे कोई दृष्टिकोण बेचना चाहते हैं। भारत में किसी समाचार-पत्र या पत्रिका का लोगों पर, लोगों के विचारों पर और लोगों के व्यवहारों पर बहुत प्रभाव होते है, वे लोगों का मार्गदर्शन करते हैं। रेडियो और टीवी के कार्यक्रमों का प्रभाव अस्थायी होता है, जबकि समाचार-पत्रों में छपने वाली सामग्री का प्रभाव स्थायी होता है। उसे विशेषत: ग्रामीण क्षेत्रों में जहां कि अस्सी प्रतिशत लोग रहते हैं, धर्म ग्रंथों में लिखित सत्य वचन के रूप में माना जाता है। क्या विदेशियों को, जो कि भारत के लोकाचार से अनभिज्ञ हैं और हमारे राष्ट्रीय हितों के प्रति शत्रुतापूर्ण भी हो सकते हैं। ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति दी जानी चाहिए, जहां के लोगों को बाहरी प्रभाव सारभूत रूप से प्रभावित करते हैं। वे कतिपय ऐसे विवादों को पुनरुज्जीवितकर सकते हैं, जो कि आज शांत हैं। उनके लेखन संदिग्ध होंगे हमारे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप माना जा सकता है। भारत लोगों को ही यह निर्णय करना चाहिए कि किस प्रकार के भारत का निर्माण किया जाना जाना है। हम गलतियां करेंगे, किंतु वे गलतियां हमारी अपनी होंगी।
अन्यथा कहीं तो रेखा खींचनी ही होगी। यह बात भले ही अटपटी लग सकती है, किंतु जनमत को आकार देने का उत्तरदायित्व उन लोगों को ही सौंपा जाना चाहिए, जो लोग देश के कार्यों में आंतरिक रूप से अंतर्ग्रस्त हैं, न कि मात्र वित्तीय रूप में। वस्तुत : यह मांग कभी भी नहीं रही हैं कि विदेशियों को भारत में राजनीतिक दल आरम्भ करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
विदेशी समाचार अभिकरण भी निर्दोष नहीं है। जनता सरकार के शासनकाल में समाचार अभिकरणों के पुनर्गठन के लिए गठित समीति ने यह कहा खा कि विदेशी समाचार अभिकरणों के समाचार प्रोपेगंडा से परिपूर्ण होते हैं। उनकी समाचार सामग्री से धारणा बनती है मानो कि वे अपने विदेश कार्यालय के विस्तार हों। यह समीति इस निष्कर्ष पर पहुंची कि विदेशों के समाचार देने के लिए भारत के पास उसका पना समाचार अभिकरण होना चाहिए, ताकि पाठकों को अधिक वस्तुनिष्ठ समाचार उपलब्ध हो सकें। पिछले पंद्रह सालों से यह प्रस्ताव लटका हुआ है।
विदेशी समाचार पत्रों को भारत में प्रवेश देने में एक और भी अड़चन है।
संविधान के अनुच्छेद-19 में यह कहा गया है कि सभी नागरिक को वाणी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। अनुच्छेद-5 में दी गई परिभाषा के अनुसार नागरिक का अर्थ है वह भारतीय, जो कि जन्म, अधिवास आदि से नागरिक हो। जैसा कि उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय में कहा गया है, किसी स्वतंत्र देश के नागरिक की परिस्थिति में अंतर्निहित प्राकृतिक अधिकारों का प्रयोग विदेशियों द्वारा नहीं किया जा सकता है।
कुछ लोग अनुच्छेद-19 को विश्वव्यापीकरण के विपरीत मान सकते हैं, किंतु यह बात तृतीय विश्वस के देशों में जीतनी सच हैं, उतनी ही सच विकसित देशों में भी है। मीडिया मुगल रूपर्ट मडार्ख को भी अमेरिका में एक टीवी नेटवर्क का स्वामी बनाने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका को राष्ट्रिक बनना पड़ा। सॉनी कंपनी को, जिसने सी.बी.एस में सारभूत संख्या में शेयर अर्जित कर लिए, अमरीकियों को यह आश्वासन देकर शांत करना पड़ा कि वह अमरीकी लोगों पर जापानी संस्कृति नहीं थोपेगी। यह तर्क उचित नहीं है कि समाचार-पत्र व्यवसाय एक उद्योग है। समाचार-पत्र इस्पात, कपड़े या पटसन जैसा कोई उत्पाद नहीं हैं। वह समाचारों और दृष्टिकोणों प्रत्ययों और विचारों का सहवर्तन है। वह कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं है, जिसमें एक सिरे पर कच्चा माल भर देने पर दूसरे सिरे से कोई तैयार माल निकल आए। लेखन, सृजनशीलता है, न कि स्वचालित क्रिया है।
पत्रकारिता एक ऐसा व्यवसाय है, जिसमें ज्ञान के किसी क्षेत्र में विशेषज्ञता अपेक्षित होती है। वह एक कला है, न कि विज्ञान है। उसकी तुलना किसी उद्योग से करने का अर्थ है मन को मशीन के स्तर तक नीचे गिरा देना। जो प्रेस बैरन पत्रकारिता को एक उद्योग मानते हैं, उन्हें इस बात का अहसास है। ऐसा न होता तो वे अच्छे से अच्छे पत्रकारों की तलाश न करते, बल्कि अपनी ही स्थापना में उनका उत्पादन कर लेते। मैं हमारे समाचार-पत्रों में छपने वाली सभी चीजों की हिमायत नहीं कर रहा हूं। उनमें बहुत कुछ कचरा भी होता है। हाल ही में जेनेवा में हुई गैट व्यापार वार्ताओं में मीडिया के मुक्त संकार्य की अमेरिका की मांग को अस्वीकार कर दिया गया। अमेरिका यह चाहता था कि मीडिया को भी बौद्धिक सम्पत्ति में शामिल किया जाए। यूरोपीय शक्तियों ने विशेषत: फ्रांस ने उसे सांस्कृतिक आक्रमण कहकर अस्वीकार कर दिया। वे जीत गए।
हाल ही में एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भारत में विदेशी समाचार-पत्रों के प्रवेश पर चर्चा की, किंतु वे किसी भी निर्णय पर नहीं पहुंचे यह महसूस किया गया कि एक परिपूर्ण चर्चा अपेक्षित होगी। संभवत : शासन को एक प्रेस कमीशन नियुक्त करना चाहिए, जो कि इस विषय पर और समाचार-पत्रों को परेशान करने वाले दूसरे पहलुओं पर विचार करे। एक मीडिया कमीशन की नियुक्ति करना अधिक बेहतर होगा, क्योंकि आक्रमण केवल समाचार-पत्रों को ही नहीं, बल्कि सूचना के अन्य क्षेत्रों को भी प्रभावित कर रहा है। (मीडिया वाद-विवाद, संवाद से साभार)
